चौदह: शुकदेवजी का आगमन

(पिछले अंक में आपने पढ़ा - राजा परीक्षित को ऋषि शमीक के प्रति अकारण दुर्व्यवहार के कारण ऋषिकुमार श्रृंगी ने शाप दिया कि उस घटना के ठीक सातवें दिन तक्षक नामक साँप के डस लेने से उनकी मृत्यु हो जाएगी। अपराध-बोध से ग्रस्त राजा ने इस शाप की सूचना पाते ही अपना राजपाट अपने पुत्र को सौंपा और आमरण अनशन का व्रत लेकर आत्मशुद्धि के लिए गंगा तट पर बैठ गए।)

राजा परीक्षित के आमरण अनशन का समाचार मिलते ही विभिन्न दिशाओं से ऋषि-मुनि अपने-अपने शिष्यों के साथ गंगा तट पर पधारने लगे। इनमें अत्रि, वसिष्ठ, च्यवन, शरद्वान, अरिष्टनेमि, भृगु, अंगिरा, पराशर, विश्वामित्र, परशुराम, भारद्वाज, गौतम, उतथ्य, इन्द्रप्रमद, इध्मवाह, मेधातिथि, देवल, अर्ष्टिषेण, और्व, कवष, पिप्पलाद, मैत्रेय, अगस्त्य, नारद, व्यास आदि सारे महान ऋषि सम्मिलित थे। संतजनों के आगमन से वह स्थल एक तीर्थस्थल बन गया। 

राजा ने आदरसहित सारे ऋषियों का सत्कार किया और उनसे दो जिज्ञासाएँ की -  प्रथम, सामान्य परिस्थितियों में जीव के क्या कर्तव्य हैं? द्वितीय, जिस जीव की मृत्यु उसके निकट आ गई हो, उसके क्या कर्तव्य हैं?

ऋषियों ने राजा परीक्षित के आमरण अनशन के कठिन व्रत का सम्मान करते हुए कहा- राजर्षि! आपकी धीरता और वैराग्य की यह भावना भगवान श्रीकृष्ण के भक्त के अनुरूप है। आपके जीवन की अंतिम वेला में हम सभी तबतक यहीं आपके साथ रहेंगे जबतक आप अपने समस्त शोक से मुक्त होकर अपने नश्वर शरीर को छोड़कर परमधाम को प्राप्त नहीं हो जाते। 

इसी बीच वहाँ शुकदेवजी पधारे। उनकी आयु सोलह वर्ष की थी। उनका शरीर श्याम वर्ण का था। उनके निर्दोष शरीर पर न कोई वस्त्र था न ही उनके वर्ण अथवा आश्रम का संकेत देनेवाला कोई बाह्य चिह्न। स्त्रियों एवं बालकों का एक दल कौतूहलवश उनके साथ-साथ चल रहा था। 

शुकदेवजी के व्यक्तित्व के लक्षणों को देखकर सूक्ष्मदर्शी ऋषियों को यह पहचानते देर न लगी कि वे परम सिद्ध शुकदेवजी हैं। समस्त ऋषिगण उनके सम्मान में अपने आसन छोड़कर उठ खड़े हुए और आदरपूर्वक उन्हें सर्वोच्च आसन पर बिठाया। चारों तरफ ऋषियों के बीच बैठे हुए शुकदेवजी वैसे ही शोभायमान हुए जैसे तारों से घिरा चन्द्रमा। शुकदेवजी की ऐसी महिमा देखकर स्त्रियाँ और बालक वहीं से लौट गए।

राजा परीक्षित ने शुकदेवजी को प्रणाम किया और निवेदन किया - भगवन्! यह भगवान श्रीकृष्ण की ही कृपा है कि मेरी मृत्यु के समय आप-जैसे दुर्लभ, एकांतवासी, योगियों के परम गुरु, परम सिद्ध पुरुष के दर्शन हुए। मुझे कृपया यह बताएँ कि मनुष्य मात्र के क्या कर्तव्य हैं? मनुष्य क्या श्रवण करे? किसका स्मरण करे? किसे जपे? किसका भजन करे? और, साथ ही, वह क्या-क्या न करे? आप मुझे कृपया यह भी बताएँ कि उस मनुष्य को क्या करना चाहिए जिसकी मृत्यु उसके सामने खड़ी हो।

शुकदेवजी बोले - हे राजन! आपका यह प्रश्न बहुत उत्तम है, क्योंकि इसमें लोकहित की भावना निहित है। आत्मज्ञान से रहित साधारण मनुष्य अपनी सारी आयु निद्रा, भोग, धनार्जन, अपने कुटुम्बियों के भरण-पोषण, आदि में नष्ट कर देता है। इस नश्वर जीवन में उसकी आसक्ति इतनी हो जाती है कि उसे अपनी अवश्यम्भावी मृत्यु का विचार तक नहीं आता। इसलिए,जो अभयपद को पाना चाहता है, उसे भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का ही श्रवण, कीर्तन एवं स्मरण करना चाहिए। हमारा मार्ग चाहे जो भी हो - ज्ञान, भक्ति या स्वधर्म के प्रति निष्ठा - हमें अपना जीवन ऐसा बना लेना चाहिए कि मृत्यु के समय भगवान की स्मृति बनी रहे। 

हे परीक्षित! अभी आपके जीवन के सात दिन शेष हैं। 

मृत्यु का समय आ जाने पर मनुष्य को घबराना नहीं चाहिए। ऐसे समय में वह अपने शरीर और इससे सम्बन्धित सभी लोगों के प्रति अपनी आसक्ति के बंधन वैराग्य के शस्त्र से काट डाले। फिर अपने मन और इन्द्रियों को सारे लौकिक विषयों से समेटकर स्थिरचित्त होकर केवल भगवान् का ध्यान करे। शुद्ध मन का भगवान में तल्लीन हो जाना ही परमपद होता है जिसे पाकर मन में केवल आनन्द रह जाता है। 

हे राजन! मैं आपको श्रीमद्भागवत महापुराण सुनाऊँगा। इसे सुनने से आप अपनी समस्त इन्द्रियों और मन को सांसारिक विषयों से हटाकर केवल भगवान का ध्यान करने में सफल होंगे। इस ग्रन्थ की शिक्षा मुझे मेरे पिता वेदव्यासजी ने द्वापर युग के अंत में दी थी। वैसे तो मेरी निष्ठा भगवान के निर्गुण रूप में है, किन्तु भगवान श्रीकृष्ण की मधुर लीलाओं के आकर्षण से मैं भी नहीं बच पाया!

हे परीक्षित! इस संसार के पदार्थ निस्सार हैं। उनका हम चाहे जितना भी संग्रह कर लें, हम दुःख से बच नहीं सकते। इसलिए, बुद्धिमान मनुष्य इन पदार्थों के लिए अनावश्यक श्रम न करे। यदि सोने के लिए भूमि उपलब्ध हो तो हम पलंग की चिंता क्यों करें? अपनी भुजाओं के रहते तकिए की क्या आवश्यकता है? जब अंजलि से ही काम चल जाए तो बर्तनों का संग्रह क्यों किया जाए? यदि वृक्षों की छाल से लज्जा ढक जाती है तो हम मूल्यवान वस्त्र क्यों पहनें? क्या वृक्षों ने फल देना बंद कर दिया है कि हमें भूखा रहना पड़े? नदियाँ क्या सूख गई हैं कि हमारी प्यास न बुझे? क्या पहाड़ों की गुफाएँ बंद कर दी गई हैं कि हमें घर बनाने की आवश्यकता पड़े? सारी बातें छोड़ो, क्या भगवान भी अब अपने शरणागतों की रक्षा नहीं करते?... जब जीवन जीने के इतने साधन उपलब्ध हैं, तो भला कोई बुद्धिमान मनुष्य क्यों धन के मद में चूर धनी लोगों के सामने हाथ पसारे?

हे राजन! जब मनुष्य इस सत्य को समझ लेता है तो वह सांसारिक पदार्थों से विरक्त होकर अपने चित्त में स्थित परम सत्य अनन्त भगवान का ही भजन करने लगता है। जब योगी इस लोक को छोड़ना चाहता है तो 'नेति' 'नेति' ('यह नहीं', 'यह नहीं') का बोध कर परमात्मा से इतर समस्त पदार्थों एवं वृत्तियों का त्याग करके केवल परमात्मा का ही ध्यान करता है। इस तल्लीनता की अवस्था में उसके लिए तब कोई कर्तव्य नहीं रह जाता है। वह त्रिगुणातीत हो जाता है - उसके लिए न तो सत्त्वगुण रह जाता है न ही रजोगुण अथवा तमोगुण। 

संसार-चक्र में पड़े हुए मनुष्य के लिए एक ही कल्याणकारी मार्ग है - भगवान श्रीकृष्ण में भक्ति। ब्रह्मा ने सारे वेदों का तीन बार अनुशीलन करके यह निष्कर्ष निकाला कि जिससे भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम जगता हो, वही सर्वोच्च धर्म है। समस्त चर-अचर प्राणियों में उनके आत्मा-रूप में भगवान श्रीकृष्ण ही विद्यमान हैं। अतः, मनुष्य को चाहिए कि सब समय और सारी परिस्थितियों में भगवान श्रीकृष्ण की ही लीलाओं का श्रवण, कीर्तन और स्मरण करे। 

हे राजन! मैंने आपके दोनों प्रश्नों का उत्तर दे दिया।

जिसे यश, सौंदर्य, धन, शक्ति, सुख, संतान, विद्या, स्वर्ग, राज्य, आयु, भोग की इच्छा हो,वह विभिन्न देवी-देवताओं की उपासना करे। किन्तु, बुद्धिमान मनुष्य को भगवद्भक्ति में ही लीन रहना चाहिए और भगवद्भक्तों की संगति में हरिकथा का सुख लेना चाहिए। 


(मूल ग्रन्थ पर आधारित)


श्याम चतुर्वेदी 


(अगले अंक में - शुकदेवजी द्वारा सृष्टि एवं भगवान के विभिन्न अवतारों का वर्णन)







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टिप्पणियाँ

  1. सारी बातें छोड़ो, क्या भगवान भी अब अपने शरणागतों की रक्षा नहीं करते?... जब जीवन जीने के इतने साधन उपलब्ध हैं, तो भला कोई बुद्धिमान मनुष्य क्यों धन के मद में चूर धनी लोगों के सामने हाथ पसारे?

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