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36: राजा ऋषभदेव का अपने पुत्रों को उपदेश

एक बार ऋषभदेव ने अपनी प्रजा के कल्याण के लिए सबके सामने अपने पुत्रों को शिक्षा देते हुए कहा - पुत्रों! यह मनुष्य-शरीर विषयभोगों के लिए नहीं होना चाहिए। इन्द्रियों के भोग तो पशुओं को भी मिलते हैं। जब तक मनुष्य अपनी इन्द्रियों के विषयों में लिप्त रहता है, उसके दुख का अंत नहीं हो सकता। वह जन्म-मृत्यु के चक्र में पड़ा रहता है। बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह भगवान के निरंतर ध्यान-मनन से, सांसारिक विषयों में वैराग्य की भावना से, सकाम कर्म छोड़कर निष्काम भक्ति से, सर्वत्र भगवान की ही सत्ता देखने के अभ्यास से अपने सांसारिक बंधन काट डाले। पुत्रों! महापुरुषों की सेवा करो। यही मुक्ति का द्वार है। महापुरुष वे हैं जो समानचित्त, परमशान्त, क्रोधहीन, सबके शुभचिंतक और सदाचार संपन्न हैं। वृक्ष श्रेष्ठ हैं। वृक्षों से पशु श्रेष्ठ हैं। पशुओं से मनुष्य, मनुष्यों से गंधर्व, गंधर्वों से किन्नर, किन्नरों से असुर और असुरों से देवता श्रेष्ठ हैं। रुद्र देवताओं में श्रेष्ठ हैं। क्योंकि रुद्र की उत्पत्ति ब्रह्मा से हुई है, इसलिए ब्रह्मा उनसे श्रेष्ठ हैं। ब्रह्मा की उत्पत्ति मुझसे हुई है, इसलिए मैं उनसे श्रेष्ठ हू...

35: राजा ऋषभदेव की कथा (भाग-1)

प्रियव्रत के वंश में राजा आग्नीध के नौ पुत्र हुए।  उनमें से एक का नाम नाभि था। नाभि बहुत प्रजावत्सल और प्रतापी राजा था। दुर्भाग्यवश, उसकी कोई संतान नहीं थी। उसने अपनी पत्नी मेरुदेवी के साथ संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ किया। पति-पत्नी की श्रद्धा और भक्ति को देख कर उन्हें वर देने के लिए भगवान अपने चतुर्भुज रूप में उनके सामने प्रकट हुए।   यज्ञ में उपस्थित ऋत्विजों ने भगवान की स्तुति की और कहा - प्रभो! आपसे हम यही वर माँगते हैं कि गिरने, ठोकर खाने, छींकने, जंभाई लेने, संकट के समय, ज्वर अथवा जीवन के अंतिम क्षणों में भी हम आपके नाम का स्मरण कर सकें।  उन्होंने आगे कहा  - हे प्रभो! आपसे हमारी एक और प्रार्थना है। आप परम परमेश्वर हैं। इसलिए, आपके लिए ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो आप दे न सकें। किन्तु, जैसे एक अल्पबुद्धि कंगाल व्यक्ति किसी धनी दाता के सामने आकर भी उससे कोई बहुमूल्य वस्तु न माँग कर भूसा माँगे, उसी तरह हमारे यजमान नाभि भी आपसे एक बहुत तुच्छ वस्तु चाहते हैं। उनकी कोई संतान नहीं है। उनकी यही अभिलाषा है कि उन्हें आपके समान गुणों वाला एक पुत्र मिले। हम और क्या कहें, न...