35: राजा ऋषभदेव की कथा (भाग-1)

प्रियव्रत के वंश में राजा आग्नीध के नौ पुत्र हुए।  उनमें से एक का नाम नाभि था। नाभि बहुत प्रजावत्सल और प्रतापी राजा था। दुर्भाग्यवश, उसकी कोई संतान नहीं थी। उसने अपनी पत्नी मेरुदेवी के साथ संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ किया। पति-पत्नी की श्रद्धा और भक्ति को देख कर उन्हें वर देने के लिए भगवान अपने चतुर्भुज रूप में उनके सामने प्रकट हुए।  

यज्ञ में उपस्थित ऋत्विजों ने भगवान की स्तुति की और कहा - प्रभो! आपसे हम यही वर माँगते हैं कि गिरने, ठोकर खाने, छींकने, जंभाई लेने, संकट के समय, ज्वर अथवा जीवन के अंतिम क्षणों में भी हम आपके नाम का स्मरण कर सकें। 

उन्होंने आगे कहा  - हे प्रभो! आपसे हमारी एक और प्रार्थना है। आप परम परमेश्वर हैं। इसलिए, आपके लिए ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो आप दे न सकें। किन्तु, जैसे एक अल्पबुद्धि कंगाल व्यक्ति किसी धनी दाता के सामने आकर भी उससे कोई बहुमूल्य वस्तु न माँग कर भूसा माँगे, उसी तरह हमारे यजमान नाभि भी आपसे एक बहुत तुच्छ वस्तु चाहते हैं। उनकी कोई संतान नहीं है। उनकी यही अभिलाषा है कि उन्हें आपके समान गुणों वाला एक पुत्र मिले। हम और क्या कहें, निस्संदेह यह आपकी माया का ही प्रभाव है कि आपको साक्षात देख कर भी नाभि की बुद्धि सन्तान-प्राप्ति से परे कुछ सोच नहीं पा रही है। आप जैसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर से हम ऐसी तुच्छ वस्तु माँग रहे हैं, इसके लिए आप हमें क्षमा करें। 

भगवान बोले  - ऋषियो! आपने हमसे एक असंभव वर माँगा है। क्योंकि, मेरे समान तो बस मैं ही हूँ; दूसरा कोई नहीं। फिर भी, आपलोगों की तपस्या व्यर्थ न होगी। मैं स्वयं ही अपने अंश से नाभि के यहाँ अवतार लूँगा। 

समय आने पर भगवान ने ऋषभदेव के रूप में नाभि की रानी मेरुदेवी के गर्भ से जन्म लिया। उनके बड़े होने पर राजा नाभि ने उन्हें राज्य का भार सौंप दिया और अपनी पत्नी के साथ बदरिकाश्रम की ओर प्रस्थान किया।  

ऋषभदेव ने संसार को आदर्श गृहस्थ जीवन की शिक्षा देने के लिए स्वयं गृहस्थ जीवनअपनाया। महापुरुष जैसा आचरण करते हैं, सामान्य लोग उसी का अनुकरण करते हैं। उन्होंने इंद्र की कन्या जयन्ती से विवाह किया।  उनके सौ गुणवान पुत्र हुए। उनमें सबसे बड़े पुत्र का नाम भरत था। बाद में इन्हीं भरत के नाम पर उस भूमि का, जिस पर उनका शासन था, 'भारतवर्ष ' नाम पड़ा।


(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण, पंचम स्कंध: द्वितीय अध्याय पर आधारित)


श्याम  चतुर्वेदी 


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