तीन: सनकादि द्वारा भागवत पाठ एवं भक्ति का उद्धार

(अब तक  -  कलियुग के प्रभाव से भक्ति के दोनों पुत्र ज्ञान और वैराग्य असमय वृद्ध हो गए। उन्हें लेकर वह वृंदावन आ गई। वहाँ एक दिन उसकी भेंट नारदजी से हुई। उसने नारदजी से इस बारे में सहायता की विनती की।)


भक्ति ने कुछ ठहर कर कहा - मुनिवर! मैं धन्य हुई जो आज आपके दर्शन हुए। अब आप ही बतायें कि मेरा दुख कैसे दूर हो।

नारदजी ने भक्ति को धैर्य बंधाते हुए कहा- भक्ति! तुम व्यर्थ दुखी हो रही हो। तुम तो सदा से भगवान की प्रिय रही हो। उनकी ही आज्ञा से तुम अपने पुत्रों ज्ञान और वैराग्य के साथ युगों से भगवान के भक्तों का पोषण करती रही हो। मुक्ति तुम्हारी दासी रही है। कलियुग में तो तुम्हारा महत्व और बढ़ गया है। इस युग में मुक्ति पाने के लिए व्रत, तीर्थ, योग, ज्ञान, वैराग्य, यज्ञ आदि कठिन साधनों की कोई आवश्यकता नहीं है; एकमात्र भक्ति ही पर्याप्त है। तुम धैर्य रखो, मैं घर-घर में प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में तुम्हारी प्रतिष्ठा कर दूँगा। 

नारदजी की बातें सुनकर भक्ति में आशा का संचार हुआ। उसने नारदजी से अनुरोध किया - मुनिवर, आप कुछ ऐसा उपाय करें कि मेरे पुत्रों का यौवन पुनः लौट आए।

नारदजी ने शास्त्रों का साधन अपनाया। उन्होंने ज्ञान और वैराग्य को उनकी पूर्व अवस्था में लाने के लिए वेद, वेदांत, गीता सबका पाठ किया, कई बार पाठ किया, परंतु उनकी अवस्था में कोई सुधार नहीं हुआ। नारदजी को समझ में नहीं आया कि उनके प्रयत्नों में कमी कहाँ रह गई!

इसी उलझन में नारदजी ज्ञान और वैराग्य को वहीं छोड़कर तीर्थ यात्रा पर निकल पड़े। उन्होंने प्रत्येक तीर्थ पर मुनियों से अपनी समस्या का समाधान पूछा किन्तु कोई भी उनके प्रश्न का स्पष्ट उत्तर नहीं दे सका।

इस तरह विभिन्न तीर्थों में विचरण करते हुए जब वे बदरीवन पहुंचे तो उनकी  भेंट सनकादि मुनियों से हुई। 
[सनकादि (सनक +आदि) मुनियों के नाम हैं - सनक, सनन्दन, सनातन और सनतकुमार। ये सभी ब्रह्मा के परम ज्ञानी, आजीवन ब्रह्मचारी पुत्र हैं। ये सदा शिशुओं की आयु में ही रहते हैं।]

नारदजी ने उन्हें भक्ति की दुर्दशा एवं उसकी सहायता करने में अपनी विफलता के बारे में बताकर उनसे विनती की - आप मुनिजन कृपया मुझे बताएँ कि इस विषय में अब क्या किया जा सकता है। साथ ही,  समाज के हर वर्ण में (सर्ववर्णेषु) भक्ति की प्रतिष्ठा कैसे की जा सकती है?

सनकादि ने उत्तर दिया -ये दोनों बातें एकमात्र  श्रीमद्भागवत के पाठ से ही संभव हैं -

"प्रलयं हि गमिष्यन्ति श्रीमद्भागवतध्वनेः। 
कलेर्दोषा इमे सर्वे सिंहशब्दाद् वृका इव ।।"
(सिंह की गर्जना से जैसे भेड़िये भाग जाते हैं, उसी प्रकार जहाँ श्रीमद्भागवत की ध्वनि होती है वहाँ कलियुग के दोष नहीं टिक पाते हैं।)

सनकादि की बातों पर नारदजी को सहसा विश्वास नहीं हुआ। थोड़ी हिचक के साथ उन्होंने कहा- मैंने वेद, वेदांत, गीता सब का प्रयोग करके देख लिया, किन्तु ज्ञान और वैराग्य पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। फिर भला श्रीमद्भागवत सुनाने से वे कैसे जग जायेंगे? श्रीमद्भागवत में भिन्न क्या है? इसके प्रत्येक श्लोक में  वेदों का सारांश ही तो है?

सनकादि ने उत्तर दिया - नारदजी, आपकी शंका उचित है। आप इसे इस तरह समझें - यद्यपि घी दूध से निकलता है, किन्तु इसका स्वाद दूध से अलग होता है। रस यों तो वृक्ष के हर भाग में होता है, किन्तु फल में संचित होकर यह विशेष मधुर हो जाता है। ईख से निकाली गई शर्करा ईख से अधिक मधुर होती है। ठीक इसी तरह यद्यपि श्रीमद्भागवत वेद, वेदांत, गीता का ही सार है, किन्तु यह उन सबसे अलग और अधिक मधुर है।
 
सनकादि ने आगे कहा - नारदजी ! आप क्या भूल गए कि जब वेदों, वेदांत, गीता की रचना करके भी व्यासदेव के चित्त को शांति नहीं मिली थी, तब आपने ही उन्हें चार श्लोकों में श्रीमद्भागवत का उपदेश देकर और भक्ति का महत्व समझा कर उनकी सारी चिंता दूर कर दी थी?

नारदजी बोले - महानुभावो, मैं सारी बातें समझ गया। अब आप हमें यह बतायें कि श्रीमद्भागवत कथा के आयोजन के लिए सबसे उपयुक्त कौन-सा स्थान है?

सनकादि ने उत्तर दिया - हरिद्वार के पास गंगा तट पर एक अत्यंत सुरम्य घाट है। वहाँ कई तपस्वी ऋषियों का निवास है। उनके तप के प्रभाव से वहां आसपास रहने वाले जीवों में पारस्परिक स्वभावगत वैर भी नहीं है। आप श्रीमद्भागवत कथा का वहीं आयोजन कराएं। 

गंगा तट पर सनकादि द्वारा भागवत-कथा सुनाई जाएगी, यह सूचना पाते ही विभिन्न लोकों से भृगु, वसिष्ठ, च्यवन, गौतम, परशुराम, विश्वामित्र, मार्कण्डेय, दत्तात्रेय, पिप्पलाद, व्यास, पराशर, आदि ऋषिगण अपने परिवार एवं शिष्यों के साथ वहाँ के लिए चल पड़े। सारे वेद, वेदांत, मंत्र-तंत्र, पुराण भी मूर्तिमान होकर वहाँ आ गए।  गंगा आदि नदियाँ, सारे तीर्थ, सारी दिशाएँ, सारे वन, सारे पर्वत, देव, गन्धर्व, दानव आदि भी  कथा सुनने के लिए वहाँ उपस्थित हो गए।

कथा सुनाने के लिए सनकादि ने अपना आसन ग्रहण किया। श्रोताओं में नारदजी, वैष्णव, वैरागी, संन्यासी और ब्रह्मचारी सबसे आगे बैठे।
 
कथा प्रारम्भ करते हुए सनकादि ने कहा - श्रीमद्भागवत की महिमा अपार है। इस ग्रन्थ में १८ हजार श्लोक और १२ स्कंध हैं। यह शुकदेवजी एवं राजा परीक्षित के संवाद के रूप में है। इसे यदि कोई एकाग्रचित्त होकर शुद्ध मन से और आत्मसंयम के साथ सुने तो  उसे मुक्ति मिल जाती है। फल की दृष्टि से यह सभी तीर्थों एवं यज्ञों से बढ़कर है। यह भगवान की साक्षात् वाङ्मयी मूर्ति है। 

अभी सनकादि श्रीमद्भागवत की महिमा का वर्णन कर ही रहे थे कि भक्ति अपने दोनों पुत्रों के साथ वहाँ प्रकट हो गई। उसके दोनों पुत्र ज्ञान और वैराग्य पुनः तरुण हो गए थे। भक्ति ने श्रीमद्भागवत के अर्थों का आभूषण पहन रखा था। वह बार-बार भावविभोर होकर 'श्रीकृष्ण!', 'गोविन्द!', 'हरे!', 'मुरारे!  'हे नाथ!' आदि भगवान के कई नामों का उच्चारण करती जाती थी।

भक्ति के इस दिव्य रूप को देखकर श्रोता-सभा विस्मय-विमुग्ध हो गई। सनकादि ने श्रोता-सभा को सूचित करते हुए कहा - यह भक्ति देवी हैं जो अभी-अभी कथा के अर्थ से निकली हैं!

भक्ति ने तब विनम्रतापूर्वक सनकादि से पूछा - मुनिगण! मैं कलियुग में लगभग नष्ट हो चली थी। आपने श्रीमद्भागवत कथा के अमृत से सींचकर मुझे पुनर्जीवन दे दिया। अब आप ही बताएं कि मैं कहाँ रहूँ?

सनकादि ने कहा - अब तुम हरिभक्तों के ह्रदय में निवास करो। वहाँ कलियुग तुम्हे छू तक नहीं सकेगा।

सनकादि का निर्देश पाकर भक्ति उसी क्षण भगवद्भक्तों के हृदय में प्रवेश कर गई। अपने हृदय में भक्ति के विराजते ही वहाँ उपस्थित भक्तों ने भगवान के दिव्य रूप के दर्शन कर लिए। सर्वत्र भक्ति का रस कुछ ऐसा उमड़ा कि किसी को अपने तन-मन की सुध नहीं रही।  

श्रीमद्भागवत कथा का ऐसा प्रभाव देखकर नारदजी अपना कौतूहल रोक न पाए। उन्होंने सनकादि से यह जिज्ञासा की कि श्रीमद्भागवत के श्रवण से किस तरह के लोग शुद्ध हो जाते हैं?

नारदजी के इस प्रश्न के उत्तर में सनकादि ने कहा - इस बारे में में हम आपको एक प्राचीन कथा सुनाते हैं।

(मूल ग्रंथ पर आधारित)

(अगले अंक में - धुंधुकारी की कथा)

श्याम चतुर्वेदी 

    

    

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