चार: धुंधुकारी की कथा -भाग-1
(अब तक - नारदजी के यह प्रश्न करने पर कि किस तरह के लोगों को श्रीमद्भागवत सुनने से लाभ होता है, सनकादि ने यह कहानी सुनाई।)
सनकादि ने कहानी शुरू की -
किसी समय तुंगभद्रा नदी के तट पर बसे एक नगर में आत्मदेव नामक ब्राह्मण रहता था। वह समस्त शास्त्रों का ज्ञाता, धर्मपरायण और धन-धान्य से संपन्न था। परन्तु, उसे एक ही दुःख था - वह संतानहीन था।
एक दिन घोर निराशा में भरकर आत्मदेव अपने घर से निकलकर वन की ओर चल पड़ा। रास्ते में उसकी भेंट एक संन्यासी से हुई। जब संन्यासी ने उसके दुःख का कारण पूछा तो उसने अपनी दुखगाथा सुनानी शुरू कर दी - मैं क्या बताऊँ! मेरी कोई संतान नहीं है। मैं इतना अभिशप्त हूँ कि मैं जिस गाय को पालता हूँ, वह गाय भी बाँझ हो जाती है। मैं जो वृक्ष लगाता हूँ उस पर भी फल नहीं लगते। अब ऐसे जीवन से क्या लाभ? मैं यही सोचकर आज प्राण त्यागने के लिए घर से निकला हूँ।
संन्यासी ने योगबल से इसका कारण जान लिया। फिर उसने आत्मदेव को समझाते हुए कहा - ब्राह्मण! तुम संतान पाने की लालसा छोड़ दो। तुम्हारे पिछले जीवन के कुछ कर्मों के कारण अगले सात जन्मों तक तुम्हारी कोई संतान नहीं हो सकती। वैसे भी, संतान सदा सुख ही देनेवाली हो, ऐसा नहीं होता।
परन्तु, आत्मदेव के ऊपर संन्यासी की इन बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उसने कहा - महाराज, मुझे इस ज्ञान से कोई लेना-देना नहीं है। जैसे भी हो, आप मुझे संतान प्राप्ति का उपाय बताएँ, नहीं तो मैं इसी क्षण आपके सामने ही अपने प्राण त्याग दूँगा!
आत्मदेव के इस हठ को देखकर संन्यासी ने कहा - विधि के लेख को मिटाने का प्रयत्न करनेवाला सदैव दुःख पाता है। किन्तु, तुम्हारे दुराग्रह ने मुझे कुछ करने को विवश कर दिया है।
यह कहकर संन्यासी ने आत्मदेव को एक फल दिया और उसे अपनी पत्नी को खिला देने के लिए कहा। साथ ही, उसने यह भी निर्देश दिया कि उसकी पत्नी एक वर्ष तक सत्य, शुचिता, दया और दान के व्रत का निष्ठापूर्वक पालन करे। वह दिन में केवल एक बार भोजन करे। यदि वह ऐसा करेगी तो उससे जन्म लेनेवाला बालक बहुत शुद्ध स्वभाव का होगा।
आत्मदेव बहुत प्रसन्न मन से वह फल लेकर अपने घर पहुँचा। उसने अपनी पत्नी धुन्धुली को उस संन्यासी की सारी बातें बताईं। किन्तु, धुन्धुली के मन में कुछ और विचार चल रहे थे। एक वर्ष तक कठिन व्रतपालन, गर्भधारण और फिर संतान को जन्म देने के कष्ट की कल्पना से ही वह काँप गई।
धुन्धुली ने अपनी चिंता अपनी बहन को बताई। उसकी बहन ने सुझाव दिया - देख, मैं इस समय गर्भवती हूँ। प्रसव होने पर मैं अपना बच्चा तुझे दे दूँगी। इस बीच तुझे बस गर्भवती होने का अभिनय करते रहना है। लोगों को यह विश्वास दिलाने के लिए कि यह बच्चा तेरा ही है, हम सर्वत्र प्रचार कर देंगे कि मेरा बच्चा मर गया। रही बात मेरे पति की, तो वह लोभी है। तुम उसे कुछ धन दे दोगी तो वह कभी भी यह भेद नहीं खोलेगा। और, जहाँ तक इस फल का प्रश्न है, इसे अपनी गाय को खिला दे। हम भी देख लेंगे कि इसका क्या प्रभाव पड़ता है!
सबकुछ धुन्धुली और उसकी बहन की योजना के अनुसार चलता रहा। समय आने पर जब धुन्धुली की बहन को बच्चा हुआ तो उसके पति ने चुपचाप उस बच्चे को धुन्धुली को सौंप दिया। धुन्धुली ने एक पुत्र को जन्म दिया है, यह समाचार सुनकर आत्मदेव और उसके परिजनों के आनंद की सीमा न रही।
धुन्धुली ने अपने पति से निवेदन किया कि उसे दूध नहीं उतर रहा है। क्यों न वह अपनी बहन को बुलाकर अपने साथ रख ले? उसकी बहन का बच्चा अभी हाल में ही मरा है। वह संभवतः इस बच्चे को दूध पिला सके।
आत्मदेव ने बिना किसी आपत्ति के उसकी यह बात मान ली। उसे सत्य का पता न था।
धुन्धुली ने बच्चे का नाम धुंधुकारी रखा।
उधर संन्यासी के फल के प्रभाव से आत्मदेव की गाय ने एक सुन्दर बच्चे को जन्म दिया। वह बालक मनुष्य के रूप में ही था। उसके कान देखने में गाय के कानों की तरह थे। आत्मदेव ने उसका नाम गोकर्ण रखा।
समय के साथ दोनों बच्चे बड़े होने लगे। गोकर्ण पंडित, ज्ञानी और सदाचारी थे। किन्तु, धुंधुकारी अत्यंत दुष्ट प्रकृति का निकला। चोरी करना, दूसरों के घर में आग लगा देना, निर्दोष जीवों का शिकार करना - ऐसे ही कामों में उसे आनंद आता था। उसने कुसंगति में पड़कर अपने पिता की समस्त संपत्ति नष्ट कर दी। अपने इस पुत्र के आचरण से अत्यंत दुखी होकर आत्मदेव बार- बार अपने भाग्य को कोसने लगा कि ऐसे पुत्र की प्राप्ति से तो निसंतान होना ही अच्छा था!
अपने पिता की ऐसी मनःस्थिति देखकर एक दिन गोकर्ण ने उसे समझाया - पिताजी, यह संसार असार है। इसमें आसक्त मनुष्य सिवाय दुःख के और कुछ नहीं पाता। धन किसका? पुत्र किसका? यह शरीर हड्डी, मांस, रक्त से बना एक पिंड मात्र ही तो है? इस शरीर को आप ' मैं ' मानना छोड़ दें। इस संसार की प्रत्येक वस्तु क्षणभंगुर है। आप इसमें आसक्त न हों। आपके लिए यही उचित है कि आप साधुओं की सेवा करें और भगवान का भजन करें। दुःख से मुक्ति का यही उपाय है।
पुत्र गोकर्ण की बातें सुनकर आत्मदेव के मन में वैराग्य आ गया। उसने घर छोड़ दिया और वन में जाकर भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति करते हुए अपना शेष जीवन बिता दिया।
पिता के घर छोड़ देने के बाद धुंधुकारी बिलकुल निरंकुश हो गया। उसके अत्याचारों से दुखी होकर एक दिन उसकी माँ कुँए में गिरकर मर गई।
गोकर्ण भी तीर्थयात्रा पर निकल गए।
धुंधुकारी के पापाचरण का कोई अंत नहीं था। वह पाँच दुश्चरित्र स्त्रियों को अपने घर ले आया और उन्हीं के साथ रहने लगा। उनके लिए तरह-तरह की भोग- सामग्रियां जुटाना ही उसके जीवन का उद्देश्य हो गया।
एक दिन वह उन स्त्रियों के कहने पर कहीं से चोरी करके बहुत सारे वस्त्र और आभूषण ले आया। चोरी की सामग्री देखकर उन स्त्रियों ने आपस में विचार किया कि ऐसे कुकर्म करता हुआ धुंधुकारी एक दिन अवश्य ही पकड़ा जाएगा। तब राजा इसका सारा धन वापस लेकर इसे प्राणदंड दे देगा। ऐसी स्थिति आने से पहले ही यदि इसे मार डाला जाए तो यह सारा धन हमारे पास ही रह जाएगा। ऐसा निश्चय करके उन्होंने सोए हुए धुंधुकारी को रस्सियों से बांधकर उसे फाँसी लगा दी। जब वह फाँसी से नहीं मरा तो उसके मुख में उन्होंने जलते हुए अंगारे डाल दिए। धुंधुकारी बहुत कष्ट भोगता हुआ मर गया।
(मूल ग्रंथ पर आधारित)
श्याम चतुर्वेदी
(अगले अंक में - धुंधुकारी की मुक्ति)
जवाब देंहटाएंगोकर्ण और धुंधकारी हर व्यक्ति में निवास करते हैं
इनसे निपटने का उपाय पतंजलि ने योगसूत्र में दिया है
विवेकख्यातिरविप्लवा हनोपाय: ।। 26 ।।
सतत जागरूकता ही धुंधकारी बनने से रोकने का उपाय
और गोकर्ण होने का अभिप्राय है।
गोकर्ण और धुंधकारी की कहानी से हमें कई शिक्षाएं मिलती हैं। हमें अपने कर्मों को उचित और धर्म के अनुसार करना चाहिए.
जवाब देंहटाएंधन्यावाद सर
Ati sundar vayakhyan he. Karf fal manusya ko nhi chodta chahe kitna bhi dimag lagaya jaye .
जवाब देंहटाएंरोचक कथासूत्र
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