दो: भक्ति की दुर्दशा और नारदजी का आगमन
भगवान श्रीकृष्ण के वैकुण्ठ प्रस्थान करते ही धरती पर सर्वत्र कलियुग ने अपना प्रभाव दिखाना आरंभ कर दिया। धीरे-धीरे राजसत्ता पर दुष्टों ने अधिकार जमा लिया। सामाजिक और नैतिक मूल्यों में तेजी से ह्रास होने लगा। सत्य, तप, शुचिता, दया, दान के प्रति लोगों का अब पूर्ववत् आग्रह नहीं रहा। शिक्षा अब निस्वार्थ ज्ञान-दान न होकर पेट पालने के लिए एक व्यवसाय मात्र होकर रह गई। पवित्र स्थानों और देवालयों की मर्यादा पाखंड के कारण नष्ट हो गई। परिवार की शांति जाती रही और सदस्यों में कलह बढ़ने लगा।
उन दिनों नारदजी पृथ्वी पर विचरण कर रहे थे। उनकी दृष्टि में पृथ्वीलोक सर्वोत्तम लोक था। किंतु, उन्होंने यहाँ जब सर्वत्र कलियुग का ऐसा प्रभाव देखा तो उनका मन खिन्न हो गया।
कई गाँवों, नगरों, तीर्थों से गुजरते हुए एक दिन वे वृंदावन पहुँचे। वहाँ यमुना नदी के तट पर उन्होंने एक अद्भुत दृश्य देखा - सैकड़ों स्त्रियों से घिरी हुई एक युवती बहुत दुखी होकर रो रही थी। वे स्त्रियाँ उसे पंखा झल रही थीं और कुछ समझा रही थीं, किंतु उसका दुख किसी तरह कम नहीं हो रहा था। उसके पास ही दो मृतप्राय वृद्ध पुरुष लेटे हुए थे जो बड़ी कठिनाई से साँस ले पा रहे थे। वह युवती उन्हें बार-बार जगाने का प्रयास करती थी और प्रत्येक बार असफल होकर असहाय भाव से रोती जाती थी।
नारदजी ने करुणावश उसके समीप जाकर उससे पूछा - देवि! तुम कौन हो? तुम्हारे आसपास ये स्त्रियाँ कौन हैं? ये दोनों वृद्ध पुरुष कौन हैं? और, तुम्हारे दुख का कारण क्या है?
युवती ने उत्तर दिया - मुनिवर! मैं भक्ति हूँ। ये स्त्रियाँ गंगा आदि पवित्र नदियाँ हैं जो मेरी सेवा के लिए यहाँ आई हैं। ये दोनों वृद्ध पुरुष वास्तव में ज्ञान और वैराग्य नामक मेरे दो पुत्र हैं। कलियुग के आगमन से हम तीनों को असमय ही बुढ़ापे ने आ घेरा। इस व्याधि के उपचार की आशा में हमलोग भटकते हुए यहाँ वृंदावन पहुँचे जहाँ अतीत में भगवान श्रीकृष्ण की सैकड़ों लीलाएं हो चुकी हैं।
भक्ति ने आगे कहा - यहाँ पहुँचते ही एक चमत्कार हुआ। मेरा बुढ़ापा जाता रहा और मैं फिर से युवती हो गई। किंतु, आश्चर्य की बात यह है कि मेरे दोनों पुत्र वृद्ध ही रह गए!
भक्ति की बात सुनकर नारदजी कुछ क्षण मौन रहे। फिर कुछ सोचते हुए-से बोले - देवि! इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। वृंदावन में अभी भी भक्ति के उपयुक्त वातावरण है। किंतु यहाँ ज्ञान और वैराग्य की कोई पूछ नहीं है। यही कारण है कि यहाँ आकर तुम्हें तो तुम्हारा यौवन मिल गया, किंतु तुम्हारे ये दोनों पुत्र कलियुग के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं।
हाय रे कलियुग! भक्ति ने क्षुब्ध स्वर में कहा - राजा परीक्षित इस दुष्ट कलियुग को मार सकते थे, फिर उन्होंने इसे जीवनदान क्यों दे दिया?
नारदजी ने उत्तर दिया - क्योंकि राजा परीक्षित विवेकवान थे। उन्हें कलियुग की कुछ उन विशेषताओं के बारे में पता था जो अन्य युगों में नहीं थीं। कलियुग का सबसे बड़ा लाभ यह है कि अन्य युगों में जो फल अत्यंत कठिन तप, योग, समाधि आदि साधनों से मिलते थे, वे ही फल कलियुग में भगवान श्रीकृष्ण के कीर्तन मात्र से मिल जाते हैं। इस युग में मुक्तिकामी जीवों की इसी सुविधा को देखते हुए राजा ने कलियुग को जीवित रहने दिया।
( मूल ग्रंथ पर आधारित)
श्याम चतुर्वेदी
(अगले अंक में - सनकादि द्वारा भागवत पाठ एवं भक्ति का उद्धार)
कलियुग केवल नाम आधारा
जवाब देंहटाएंश्रद्धा और भक्ति दोनों भाव क्षीण हो रहे हैं
जवाब देंहटाएंSatya vachan Kalyug Keval Naam Adhara, Sumir Sumir Nar Utharin Para.
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