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नौ: भीष्म का देह-त्याग

महाभारत युद्ध का परिणाम अत्यंत भयावह था। इसमें पांडव और कौरव दोनों पक्षों को बहुत बड़ा मूल्य चुकाना पड़ा था। यद्यपि युधिष्ठिर को उनका राज्य मिल गया था, उन्हें इस बात की तनिक भी प्रसन्नता नहीं थी। उन्हें बार-बार यही लगता था कि अपने नश्वर शरीर और तुच्छ राज्य के लिए उन्होंने न जाने कितने स्वजनों और गुरुजनों की बलि चढ़ा दी थी! कितनी स्त्रियों ने अपना पति खो दिया था, कितने बच्चे अनाथ हो गए थे! उन्हें वेदव्यास आदि ऋषियों ने - स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने भी - इस युद्ध की अनिवार्यता एवं इसके कारण होनेवाले अवश्यम्भावी विनाश के बारे में बहुत समझाया, किन्तु उनका अपराधबोध किसी तरह कम नहीं हुआ।  अवसादग्रस्त युधिष्ठिर तब कुरुक्षेत्र के मैदान की ओर चले जहाँ अर्जुन के बाणों से घायल भीष्म पितामह शर-शय्या पर पड़े हुए थे। युधिष्ठिर के साथ उनके सारे भाई, व्यासजी ,धौम्य ऋषि एवं स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण भी हो लिए। भीष्म पितामह की आसन्न मृत्यु जानकर उनके दर्शन के लिए समस्त महान ऋषि-मुनि, जिनमें नारद, भरद्वाज, वृहदश्व, परशुराम, वसिष्ठ, गौतम, अत्रि, विश्वामित्र, शुकदेव, त्रित, कश्यप, आंगिरस प्रमुख थे, अपने-अपने शि...

आठ: परीक्षित के जन्म की कथा

महाभारत युद्ध समाप्त हो गया था। युधिष्ठिर को उनका न्यायोचित राज्य मिल गया था। किन्तु, भगवान श्रीकृष्ण की भूमिका अभी समाप्त नहीं हुई थी। पांडवों की इच्छा एवं आवश्यकता को ध्यान में रखकर उन्होंने कुछ और  दिनों तक उनके साथ रहने का निश्चय किया। वहाँ रहकर भगवान ने युधिष्ठिर के द्वारा तीन अश्वमेध यज्ञ कराए। इन यज्ञों के माध्यम से युधिष्ठिर का दूर-दूर तक यश फैला और उनकी सत्ता भली-भांति स्थापित हो गई।  जब ऐसा प्रतीत होने लगा कि सबकुछ लगभग सामान्य हो चला है, तब भगवान द्वारका जाने के लिए अपने रथ पर सवार हुए। सात्यिकि और उद्धव भी उनके साथ चले। तभी उत्तरा (अभिमन्यु की पत्नी) दौड़ती हुई भगवान श्रीकृष्ण की ओर आई। वह बहुत घबराई हुई थी। वह  कातर स्वर में भगवान से प्रार्थना करने लगी - हे देवाधिदेव, मेरी रक्षा करें। एक दहकता हुआ लोहे का बाण बहुत तीव्र गति से मेरी ओर बढ़ा चला आ रहा है। मुझे अपने प्राणों की चिंता नहीं है, आप बस मेरे गर्भ की रक्षा कर लें।  भगवान समझ गए कि अश्वत्थामा ने पांडवों के वंश को समाप्त कर देने के उद्देश्य से ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया है। उन्होंने तत्काल उत्तरा के ...

सात: अश्वत्थामा का जघन्य कर्म एवं अर्जुन द्वारा दंड

सूतजी ने राजा परीक्षित की कथा आरम्भ करते हुए कहा -  महाभारत युद्ध का अंतिम चरण था। पांडव-कौरव दोनों पक्षों के अधिकांश योद्धा वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। द्वंद्वयुद्ध में भीम ने अपनी गदा से दुर्योधन की जांघ तोड़ डाली थी। शारीरिक एवं मानसिक आघात से टूट चुका दुर्योधन अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था।  यह सोचकर कि पांडवों की हानि देखकर दुर्योधन प्रसन्न होगा, अश्वत्थामा  ने द्रौपदी के सोते हुए पाँच पुत्रों के सिर काटकर उसे भेंट किया। किन्तु उसके इस जघन्य कृत्य से दुर्योधन थोड़ा भी प्रसन्न नहीं हुआ। उलटे, उसने अश्वत्थामा को इसके लिए बहुत धिक्कारा।  अपने पुत्रों की ऐसी हृदयविदारक मृत्यु देखकर द्रौपदी के शोक की सीमा न रही। उसकी आँखों से बहते आँसुओं ने अर्जुन को भी विचलित कर दिया। उसने भीषण क्रोध में भरकर प्रतिज्ञा की - कल्याणि! मैं तुम्हारे आँसू तभी पोछूँगा जब मैं उस आततायी अश्वत्थामा का सिर काटकर तुम्हारे सामने लाऊँगा। [ इन छह प्रकार के अपराधियों को आततायी कहा गया है - दूसरों की संपत्ति को आग लगानेवाला, विष देनेवाला, शस्त्र का अनुचित प्रयोग करनेवाला, दूसरों का धन, खेत या ...

छह: नैमिषारण्य में ऋषियों का प्रश्न

  प्रथम स्कंध कलियुग में प्राणियों का कल्याण कैसे हो - इस पर विचार करने के लिए एक बार नैमिषारण्य में शौनक आदि ऋषियों की  दीर्घकालिक सभा हुई। सूतजी वक्ता के आसन पर विराजमान हुए।  ऋषियों ने उनसे निवेदन किया - सूतजी! आपने समस्त धर्मशास्त्रों का अध्ययन किया है। साथ ही साथ आपने उनको आत्मसात् भी किया है। आपका हृदय सरल एवं शुद्ध है। इस कारण आप पर गुरूजनों की कृपा रही है।  हमारी जिज्ञासा है - एक तो कलियुग के प्राणियों की आयु, साधना की क्षमता और बुद्धि कम है, और, दूसरी तरफ विभिन्न शास्त्रों के विभिन्न मत हैं। ऐसे में, लोग किस शास्त्र का अनुकरण करें, यह उन्हें समझ में नहीं आता। इस विषय  में आप कृपया हमारा मार्गदर्शन करें।  ऋषियों की बात सुनकर सूतजी ने प्रसन्न  होकर  कहा  - ऋषिगण, विश्वकल्याण के लिए आपने बहुत सुन्दर जिज्ञासा की है। वास्तव में, श्रीमद्भागवत ही वह ग्रन्थ है जो कलियुग में सब के लिए कल्याणकारी है। यह समस्त वेदों का सार है। यह संसार में अज्ञान के अंधकार से मुक्ति दिलानेवाला दीपक है। इसे सुनने से भगवान श्रीकृष्ण के प्रति निष्काम भक्ति बढ़ती है...

पाँच: धुंधुकारी की मुक्ति

अपने कुकर्मों के कारण हुई अस्वाभाविक मृत्यु के बाद धुंधुकारी एक भयानक प्रेत बना। वह बवंडर की तरह दसों दिशाओं में भटकने लगा। सदा सर्दी-गर्मी और भूख-प्यास से व्याकुल होने के कारण उसे कहीं भी चैन नहीं मिलता था।  कई महीनों की तीर्थ यात्रा के बाद गोकर्ण अपने घर लौटे। रात में जब वे आँगन में सोने गए तो धुंधुकारी भी वहाँ चला आया। उसने कभी भेड़ा, कभी हाथी, कभी भैंसा, कभी इंद्र, कभी अग्नि बनकर गोकर्ण को अपनी उपस्थिति दिखानी शुरू की। अंत में वह एक मनुष्य के रूप में उनके सामने प्रकट हुआ।  गोकर्ण उसे पहचान न पाए। उन्होंने  उससे सहानुभूतिपूर्वक पूछा - तू कौन है? तेरी यह अवस्था कैसे हो गई? तू प्रेत है, पिशाच है या कोई मायावी राक्षस है?   धुंधुकारी ने  तब  रोते-रोते अपनी सारी कहानी* सुनाई। (*कृपया मेरा पिछला blog क्रम 4 - धुंधुकारी की कथा भाग-1 देखें। ) उसकी बातें सुनकर गोकर्ण ने कहा - मैंने अपनी तीर्थयात्रा के समय तुम्हारी मृत्यु का समाचार सुना था। उसके बाद मैंने सारे तीर्थों में, यहाँ तक कि गया तीर्थ में भी, तुम्हारे लिए विधिवत पिण्डदान किया। मुझे आश्चर्य है कि तुम्ह...