छह: नैमिषारण्य में ऋषियों का प्रश्न

 प्रथम स्कंध

कलियुग में प्राणियों का कल्याण कैसे हो - इस पर विचार करने के लिए एक बार नैमिषारण्य में शौनक आदि ऋषियों की  दीर्घकालिक सभा हुई। सूतजी वक्ता के आसन पर विराजमान हुए। 

ऋषियों ने उनसे निवेदन किया - सूतजी! आपने समस्त धर्मशास्त्रों का अध्ययन किया है। साथ ही साथ आपने उनको आत्मसात् भी किया है। आपका हृदय सरल एवं शुद्ध है। इस कारण आप पर गुरूजनों की कृपा रही है।  हमारी जिज्ञासा है - एक तो कलियुग के प्राणियों की आयु, साधना की क्षमता और बुद्धि कम है, और, दूसरी तरफ विभिन्न शास्त्रों के विभिन्न मत हैं। ऐसे में, लोग किस शास्त्र का अनुकरण करें, यह उन्हें समझ में नहीं आता। इस विषय  में आप कृपया हमारा मार्गदर्शन करें। 

ऋषियों की बात सुनकर सूतजी ने प्रसन्न  होकर  कहा  - ऋषिगण, विश्वकल्याण के लिए आपने बहुत सुन्दर जिज्ञासा की है। वास्तव में, श्रीमद्भागवत ही वह ग्रन्थ है जो कलियुग में सब के लिए कल्याणकारी है। यह समस्त वेदों का सार है। यह संसार में अज्ञान के अंधकार से मुक्ति दिलानेवाला दीपक है। इसे सुनने से भगवान श्रीकृष्ण के प्रति निष्काम भक्ति बढ़ती है एवं रजोगुण तथा तमोगुण के भाव नष्ट हो जाते हैं। फिर शुद्ध सत्त्व में स्थित होने से भगवान के तत्त्व का ज्ञान हो जाता है। भगवान के प्रति भक्ति होते ही मन में अपने-आप ज्ञान और वैराग्य का भाव आ जाता है। हृदय की समस्त ग्रंथियां नष्ट हो जाती हैं, सारे संदेह मिट जाते हैं और जीव अपने सारे कर्म-बन्धनों से मुक्त हो जाता है। 

परमात्मा एक ही हैं। किन्तु, उन्होंने संसार की स्थिति, उत्पत्ति एवं नाश के लिए प्रकृति के तीन गुणों - सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण - के अनुरूप क्रमशः विष्णु, ब्रह्मा एवं महेश का रूप धारण किया है। महात्माओं द्वारा भगवान के सत्त्वमय रूप विष्णु की आराधना को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है क्योंकि यही निष्काम भक्ति है। 

वास्तव में, वेदों में वर्णित ज्ञान का चरम लक्ष्य भगवान श्रीकृष्ण ही हैं। समस्त यज्ञ उनके लिए हैं। समस्त योग, कर्म और तप उनके निमित्त हैं। समस्त कर्म उन्हीं में मिलकर समाप्त हो जाते हैं। 

वासुदेवपरा वेदा वासुदेवपरा मखाः।

वासुदेवपरा योगा वासुदेवपराः क्रियाः।।

वासुदेवपरं ज्ञानं वासुदेवपरं तपः।

वासुदेवपरो धर्मो  वासुदेवपरा गतिः।।

परमात्मा एक ही हैं। किन्तु, वे भिन्न-भिन्न प्राणियों में उसी तरह अलग-अलग रूपों में दिखाई पड़ते हैं जैसे एक ही अग्नि भिन्न-भिन्न लकड़ियों में अलग-अलग रूप में दीखती है।

इसी तरह भगवान के अवतारों के बारे में समझना चाहिए। जैसे  किसी अक्षय सरोवर से छोटे-बड़े हजारों नदी-नाले निकलते हैं, वैसे ही भगवान के असंख्य अवतार होते हैं। जहाँ तक अन्य अवतारों का प्रश्न हैं, वे सभी भगवान के अंश मात्र हैं, किन्तु भगवान श्रीकृष्ण तो स्वयं भगवान ही हैं। 

यह सारा ब्रह्माण्ड भगवान की लीला मात्र है जिसका वे सृजन, पालन और संहार करते हैं। परन्तु, इस सारी प्रक्रिया में वे स्वयं कभी लिप्त नहीं होते। वे समस्त जीवों के भीतर होते हुए भी उनसे स्वतंत्र हैं। 

वेदव्यासजी ने समस्त वेदों, इतिहास ग्रंथों का सार श्रीमद्भागवत में रखा एवं सारे प्राणियों के कल्याण के लिए अपने पुत्र शुकदेवजी को इसका ज्ञान कराया। बाद में शुकदेवजी ने राजा परीक्षित को इसकी कथा सुनाई। सौभाग्यवश, जब शुकदेवजी राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत सुना रहे थे, मैं भी वहाँ उपस्थित था। मैं अपनी बुद्धि से इस कथा का जो भी अर्थ समझ सका, आपलोगों को वही सुनाऊँगा।  

शौनकजी ने कहा - सूतजी! आप बड़े भाग्यशाली हैं जो आपने यह कथा शुकदेवजी के मुख से सुनी। आप हमें  बताएँ कि यह कथा किस युग में, किस स्थान पर और किस सन्दर्भ में सुनाई गई थी? हमें यह बात और आश्चर्यजनक लगती है कि  सदा मौन धारण करनेवाले, सांसारिक लोगों से दूर रहनेवाले, आत्मा ही आत्मा में लीन रहनेवाले शुकदेवजी ने कैसे राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत कथा सुनाना स्वीकार कर लिया! शुकदेवजी को हम  सादर प्रणाम करते हैं। वे इतने पवित्र हैं कि उनके चरण जिस घर के द्वार पर पड़ें, वह घर तीर्थ बन जाता है। वे गृहस्थों के द्वार पर उतनी ही देर रुकते हैं जितनी देर में एक गाय दुही जाती है। 

शुकदेवजी के बारे में हमने यह कथा सुनी है कि जब वे घर से निकलकर संन्यास लेने के लिए वन की ओर चले तो पुत्रमोह से व्याकुल उनके पिता व्यासदेवजी भी उनके पीछे चल पड़े। रास्ते में कुछ स्त्रियाँ स्नान कर रही थीं। शुकदेवजी युवा थे और उनके शरीर पर कोई वस्त्र नहीं था। इस अवस्था में भी उन्हें अपने सामने से जाते देखकर स्त्रियों को कोई संकोच नहीं हुआ। वे पूर्ववत् स्नान  करती रहीं। किन्तु, उन्होंने ज्योंही शुकदेवजी के पीछे-पीछे आते उनके पिता को देखा - जो वृद्ध और ज्ञानी थे - उन्होंने सहज लज्जा भाव से भरकर झटपट अपने-आपको वस्त्रों से ढक लिया। 

व्यासदेवजी को स्त्रियों के इस विचित्र व्यवहार से बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने जब स्त्रियों से इसका कारण पूछा तो उन स्त्रियों ने उत्तर दिया -  इसका कारण यह है कि आपकी दृष्टि में अभी भी स्त्री-पुरुष का भेद है। किन्तु, आपके युवा पुत्र की शुद्ध दृष्टि स्त्री-पुरुष में कोई भेद नहीं करती। 

शौनकजी ने फिर सूतजीसे अनुरोध किया - सूतजी, आप हमें कृपया यह भी सुनाएँ कि पांडव वंश के महान राजा परीक्षित ने अपना सारा राजपाट छोड़कर गंगा तट पर अनशन करके प्राणत्याग करने का निश्चय क्यों किया?

(मूल ग्रंथ पर आधारित)

To be continued ...


श्याम  चतुर्वेदी 






















टिप्पणियाँ

  1. बहुत सुंदर तरीके से व्याख्यान किया हे। सच में भागवत एक संपूर्ण सत्य।

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