पाँच: धुंधुकारी की मुक्ति
अपने कुकर्मों के कारण हुई अस्वाभाविक मृत्यु के बाद धुंधुकारी एक भयानक प्रेत बना। वह बवंडर की तरह दसों दिशाओं में भटकने लगा। सदा सर्दी-गर्मी और भूख-प्यास से व्याकुल होने के कारण उसे कहीं भी चैन नहीं मिलता था।
कई महीनों की तीर्थ यात्रा के बाद गोकर्ण अपने घर लौटे। रात में जब वे आँगन में सोने गए तो धुंधुकारी भी वहाँ चला आया। उसने कभी भेड़ा, कभी हाथी, कभी भैंसा, कभी इंद्र, कभी अग्नि बनकर गोकर्ण को अपनी उपस्थिति दिखानी शुरू की। अंत में वह एक मनुष्य के रूप में उनके सामने प्रकट हुआ।
गोकर्ण उसे पहचान न पाए। उन्होंने उससे सहानुभूतिपूर्वक पूछा - तू कौन है? तेरी यह अवस्था कैसे हो गई? तू प्रेत है, पिशाच है या कोई मायावी राक्षस है?
धुंधुकारी ने तब रोते-रोते अपनी सारी कहानी* सुनाई। (*कृपया मेरा पिछला blog क्रम 4 - धुंधुकारी की कथा भाग-1 देखें। )
उसकी बातें सुनकर गोकर्ण ने कहा - मैंने अपनी तीर्थयात्रा के समय तुम्हारी मृत्यु का समाचार सुना था। उसके बाद मैंने सारे तीर्थों में, यहाँ तक कि गया तीर्थ में भी, तुम्हारे लिए विधिवत पिण्डदान किया। मुझे आश्चर्य है कि तुम्हें अब तक मुक्ति क्यों नहीं मिली! अब तुम ही बताओ, तुम्हारे लिए और क्या किया जा सकता है?
धुंधुकारी बोला - भाई, मुझे कुछ नहीं पता। मैं केवल इतना जानता हूँ कि चाहे वह गया हो या और कोई तीर्थ, मेरे चाहे जितने श्राद्ध कर लो, मेरी मुक्ति नहीं हो सकती। अब तुम ही इसका कोई और उपाय सोचो।
गोकर्ण ने रात भर इस विषय पर विचार किया। अगले दिन उन्होंने विद्वानों की भी राय ली, किन्तु कोई इसका समाधान नहीं दे सका ।
गोकर्ण ने तब सूर्यदेव की आराधना की। सूर्यदेव ने स्पष्ट स्वरों में कहा - श्रीमद्भागवत के सप्ताह-पारायण से ही धुंधुकारी को मुक्ति मिल सकती है।
गोकर्ण ने तदनुसार श्रीमद्भागवत कथा प्रारम्भ की। इस कथा को सुनने के लिए दूर-दूर से लोग वहाँ पहुँच गए। धुंधुकारी भी वायु के रूप में वहाँ आ गया और एक सात गाँठ वाले बाँस के भीतर प्रवेश कर गया।
पहले दिन की संध्या को, जब उस दिन की कथा को विराम दिया गया, एक विचित्र घटना घटी। जिस बाँस में धुंधुकारी वायु बनकर छिपा बैठा था, उसकी एक गाँठ बहुत जोर की ध्वनि करती हुई फट गई।
यही क्रम चलता रहा। जैसे-जैसे श्रीमद्भागवत कथा आगे बढ़ती गई, प्रत्येक दिन उस बाँस की एक-एक गाँठ फटती चली गई। सप्ताह के अंतिम दिन जब श्रीमद्भागवत का पारायण पूरा हुआ, बाँस की सातवीं गाँठ को फाड़कर धुंधुकारी दिव्य रूप धारण करके सबके सामने प्रकट हो गया। वह अब प्रेतयोनि से सदा के लिए मुक्त हो चुका था।
धुंधुकारी ने अपने भाई गोकर्ण को आदरसहित प्रणाम किया और कहने लगा - भाई, तुमने श्रीमद्भागवत की कथा सुनाकर मुझे प्रेत योनि से मुक्ति दिला दी है। यह सच है कि जिस तरह आग लकड़ियों को जला डालती है, उसी तरह श्रीमद्भागवत कथा हमारे पापों को भस्म कर देती है। वह मनुष्य बहुत अभागा है जो दिन-रात रोग-दुःख से युक्त अपने क्षणभंगुर शरीर में ही आसक्त रहता है और अपनी मुक्ति के लिए प्रयत्न नहीं करता।
जिस समय धुंधुकारी ये बातें कर रहा था, उसी समय वैकुण्ठ लोक से भगवान् के पार्षद उसके लिए एक दिव्य विमान लेकर वहाँ उपस्थित हो गए।
श्रीमद्भागवत कथा का ऐसा प्रभाव देखकर गोकर्ण को प्रसन्नता तो हुई, किन्तु उनके मन में एक संशय ने भी जन्म लिया। उन्होंने पार्षदों से पूछा - पार्षदगण! आप कृपया मेरी एक शंका का समाधान करें। श्रीमद्भागवत की कथा यहाँ बैठे सारे लोगों ने सुनी, किन्तु इसके फल में ऐसा भेद क्यों हुआ? धुंधुकारी को तो मुक्ति मिल गई, किन्तु बाकी लोगों को मुक्ति क्यों नहीं मिली?
पार्षदों ने उत्तर दिया - हे गोकर्ण! यह सत्य है कि इस कथा को सबने सुना, परन्तु किसी ने धुंधुकारी की तरह इसका मनन नहीं किया। धुंधुकारी ने स्थिरचित्त से कथा सुनी और उस पर अच्छी तरह मनन भी किया। सुनिए -
अदृढ़ं च हतं ज्ञानं प्रमादेन हतं श्रुतं।
संदिग्धो हि हतो मंत्रो व्यग्रचित्तो हतो जपः।।
(ज्ञान यदि दृढ न हो तो वह नष्ट हो जाता है। इसी तरह प्रमाद से श्रवण, संदेह होने से मंत्र और मन के भटकते रहने से जप व्यर्थ हो जाता है।)
यदि बाकी लोग भी विश्वास और एकाग्रता से श्रीमद्भागवत कथा सुनें तो उनकी मुक्ति अवश्य होगी। और, हे गोकर्ण! आप जैसे पुण्यात्मा को अपने लोक ले जाने के लिए तो स्वयं भगवान ही यहाँ पधारेंगे।
यह कहकर धुंधुकारी को अपने साथ लेकर हरिकीर्तन करते हुए पार्षद वैकुण्ठ लोक चले गए।
श्रावण-मास में गोकर्ण ने एक बार फिर श्रीमद्भागवत कथा कही। इस बार सबने दृढ़तापूर्वक अपने चित्त की पूरी एकाग्रता के साथ कथा सुनी।
कथा के संपन्न होने पर स्वयं भगवान वहाँ पधारे। उन्होंने गोकर्ण का आलिंगन करके उनका अपने समान ही स्वरूप बना दिया। बाकी श्रोताओं को भी दिव्य रूप मिल गया। उस गाँव में जितने मनुष्य एवं जीव थे, गोकर्ण की प्रार्थना से उनको भी भगवान् के विमान पर स्थान मिला। फिर वे सारे लोग भगवान के साथ वैकुण्ठलोक को चले गए।
(मूल ग्रंथ पर आधारित)
श्याम चतुर्वेदी
(अगले अंक में - नैमिषारण्य में ऋषियों की सभा)
इस कथा के माध्यम से आपने एक बहुत महत्वपूर्ण और प्रासंगिक बात को सामने रखा है — कि केवल धार्मिक विधियों या कर्मकांडों को करना ही पर्याप्त नहीं होता, जब तक मन और चित्त उसमें पूरी तरह से एकाग्र न हो। धुंधुकारी की दशा और उसके प्रेत योनि से मुक्ति की यह कथा स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि केवल सुनना या भाग लेना ही नहीं, बल्कि पूरे विश्वास, श्रद्धा और मनन के साथ कथाओं से जुड़ना जरूरी है। यह बात आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है, जब हम अक्सर धार्मिक कार्यों को औपचारिकता की तरह निभाते हैं, लेकिन उसके पीछे की आत्मा से नहीं जुड़ पाते। कथा के माध्यम से गोकर्ण के प्रश्न और भगवान के पार्षदों का उत्तर बहुत ही तार्किक और बौद्धिक रूप से संतुलित लगा। आपने जिस स्पष्टता से इस संवाद को प्रस्तुत किया, वह पाठक को केवल पढ़ने तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे रुककर सोचने पर भी मजबूर करता है।यह न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से, बल्कि मानसिक एकाग्रता और जीवन के उद्देश्य को लेकर भी एक महत्वपूर्ण संकेत देता है। प्रस्तुत कथानक ने विषय को एक गंभीर दृष्टि से देखने का अवसर दिया।
जवाब देंहटाएंBhagwat ek sampoorna satya Or vyakhyan ati sundar.
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