सात: अश्वत्थामा का जघन्य कर्म एवं अर्जुन द्वारा दंड
सूतजी ने राजा परीक्षित की कथा आरम्भ करते हुए कहा -
महाभारत युद्ध का अंतिम चरण था। पांडव-कौरव दोनों पक्षों के अधिकांश योद्धा वीरगति को प्राप्त हो चुके थे। द्वंद्वयुद्ध में भीम ने अपनी गदा से दुर्योधन की जांघ तोड़ डाली थी। शारीरिक एवं मानसिक आघात से टूट चुका दुर्योधन अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था।
यह सोचकर कि पांडवों की हानि देखकर दुर्योधन प्रसन्न होगा, अश्वत्थामा ने द्रौपदी के सोते हुए पाँच पुत्रों के सिर काटकर उसे भेंट किया। किन्तु उसके इस जघन्य कृत्य से दुर्योधन थोड़ा भी प्रसन्न नहीं हुआ। उलटे, उसने अश्वत्थामा को इसके लिए बहुत धिक्कारा।
अपने पुत्रों की ऐसी हृदयविदारक मृत्यु देखकर द्रौपदी के शोक की सीमा न रही। उसकी आँखों से बहते आँसुओं ने अर्जुन को भी विचलित कर दिया। उसने भीषण क्रोध में भरकर प्रतिज्ञा की - कल्याणि! मैं तुम्हारे आँसू तभी पोछूँगा जब मैं उस आततायी अश्वत्थामा का सिर काटकर तुम्हारे सामने लाऊँगा। [ इन छह प्रकार के अपराधियों को आततायी कहा गया है - दूसरों की संपत्ति को आग लगानेवाला, विष देनेवाला, शस्त्र का अनुचित प्रयोग करनेवाला, दूसरों का धन, खेत या स्त्री लूटनेवाला।]
यह कहकर अर्जुन रथ पर सवार होकर, जिसे भगवान श्रीकृष्ण हाँक रहे थे, अश्वत्थामा की खोज में निकल पड़ा। अर्जुन को इस तरह अत्यंत क्रोध में वेग से आता देखकर अश्वत्थामा भी अपने प्राणों की रक्षा के लिए अपने रथ से भागने लगा। अंत में, जब उसने देखा कि उसके घोड़े थक गए हैं और प्राणरक्षा का कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा, तो उसने अर्जुन पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर दिया।
अश्वत्थामा द्वारा ब्रह्मास्त्र चलाते ही सारी दिशाओं में प्रचंड प्रकाश फैलने लगा। उसके ऐसे प्रभाव को देखकर एक क्षण को अर्जुन भी दिग्भ्रमित हो गया। उसने भगवान् श्रीकृष्ण से पूछा - हे देवाधिदेव, यह भयानक तेज कैसा है और कहाँ से आ रहा है? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है।
भगवान बोले - अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र चलाया है। उसने अपनी प्राणरक्षा के लिए इसे चला तो दिया है किन्तु वह इसे लौटाना नहीं जानता। इसे केवल ब्रह्मास्त्र द्वारा ही शांत किया जा सकता है। इसलिए तुम भी ब्रह्मास्त्र चलाओ।
अर्जुन ने तत्क्षण अपना ब्रह्मास्त्र चलाकर अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र को निरस्त कर दिया। फिर उसने अश्वत्थामा को झपटकर पकड़ लिया और उसे रस्सी से बांधकर अपने शिविर की ओर ले चला।
सारथी भगवान श्रीकृष्ण ने कहा - अर्जुन! इस आततायी ब्राह्मण को तुम इसी क्षण मार डालो। इसने सोते हुए निरपराध बच्चों को मारा है। सोते हुए, असावधान,नशे में चूर, पागल, बालक, स्त्री, मूर्ख, भयभीत, रथविहीन और शरणागत शत्रु - ऐसे व्यक्तियों को मारना घोर अधर्म है। फिर तुमने द्रौपदी से प्रतिज्ञा भी तो की है कि तुम उसे उसके पुत्रों की हत्या करनेवाले अपराधी का सिर काटकर दोगे?
भगवान के इन तर्कपूर्ण वचनों को सुनकर भी अर्जुन कुछ विचारकर चुप रहा। वह अश्वत्थामा को लेकर अपने शिविर पहुँचा जहाँ द्रौपदी अपने मृत पुत्रों के शोक में डूबी हुई थी। अर्जुन ने अश्वत्थामा को द्रौपदी के सामने धकेल दिया। द्रौपदी ने सिर उठाकर देखा - उसके पुत्रों का हत्यारा उसके सामने एक पशु की भांति रस्सी से बंधा हुआ सिर झुकाकर निःशब्द खड़ा है।
अश्वत्थामा को इस अवस्था में देखकर द्रौपदी का हृदय सहसा करुणा से भर गया। उसे ऐसा लगा जैसे उसके रूप में उसके मृत पिता गुरु द्रोणाचार्य ही असहाय होकर इस समय सामने खड़े हैं। उसने अर्जुन से अधीर होकर प्रार्थना की - छोड़ दो, इसे अभी छोड़ दो! इसके पिता के आपके ऊपर बहुत उपकार हैं। उनकी कृपा से ही आपने समस्त शास्त्रों का रहस्य और धनुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया है। गुरु की मृत्यु के बाद अब यह पुत्र ही अपनी माता के जीवन का एकमात्र आधार रह गया है। मैं नहीं चाहती कि जिस तरह मैं अपने पुत्रों की मृत्यु पर शोक कर रही हूँ, इसकी माता भी अपने पुत्र की मृत्यु पर रोए।
द्रौपदी के ये वचन उसकी स्वाभाविक करुणा, धर्म एवं न्याय से पूर्ण थे। वहाँ उपस्थित युधिष्ठिर,अर्जुन,नकुल और सहदेव ने, यहाँ तक कि स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की सराहना की।
किन्तु भीम उनसे सहमत नहीं हुआ। उसने क्रोधपूर्वक कहा - इस आततायी अश्वत्थामा ने सोते हुए निरपराध बालकों की बिना किसी कारण के हत्या की है। इसके इस कुकर्म से न तो इसके स्वामी दुर्योधन को कोई लाभ हुआ न ही स्वयं इसको। ऐसे व्यक्ति को जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है!
भगवान् ने द्रौपदी और भीम दोनों की बातें सुनी और फिर हँसते हुए-से बोले - अर्जुन! शास्त्रों में कहा गया है कि ब्राह्मण का वध नहीं किया जा सकता। साथ ही, यह भी कहा गया है कि आततायी को कभी जीवित नहीं छोड़ना चाहिए। अश्वत्थामा ब्राह्मण भी है और आततायी भी। अब तुम शास्त्रों की इन दोनों बातों का पालन करो। तुमने द्रौपदी के सामने जो प्रतिज्ञा की है, उसको भी पूरा करो।
अर्जुन ने भगवान् का संकेत समझ लिया। शास्त्रों के अनुसार,अपराधी ब्राह्मण का सिर मूँड देना, उसका धन छीन लेना और उसे घर से भगा देना - ये सारे दंड उसके वध के समान ही हैं। ऐसा विचारकर अर्जुन ने अपनी तलवार से अश्वत्थामा का सिर मूँड दिया, उसके सिर में स्थित मणि निकाल ली और उसकी रस्सी खोलकर उसे शिविर से बाहर भगा दिया।
(मूल ग्रंथ पर आधारित)
(अगले अंक में - परीक्षित का जन्म )
श्याम चतुर्वेदी
और u
सर मुझे आपका लेख पढ़कर बहुत खुशी हुई और यह वाकई बहुत ही विचारपूर्ण, ज्ञानवर्धक ब्लॉग है।
जवाब देंहटाएंधन्यवाद सर 🙏🙏
अश्वत्थामा से जुड़ा नरो वा कुंजरो वा प्रसंग इतना विख्यात है कि इस प्रसंग को नए सिरे से पढ़ना बहुत ज्ञानवर्धक लगा
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