आठ: परीक्षित के जन्म की कथा

महाभारत युद्ध समाप्त हो गया था। युधिष्ठिर को उनका न्यायोचित राज्य मिल गया था। किन्तु, भगवान श्रीकृष्ण की भूमिका अभी समाप्त नहीं हुई थी। पांडवों की इच्छा एवं आवश्यकता को ध्यान में रखकर उन्होंने कुछ और  दिनों तक उनके साथ रहने का निश्चय किया। वहाँ रहकर भगवान ने युधिष्ठिर के द्वारा तीन अश्वमेध यज्ञ कराए। इन यज्ञों के माध्यम से युधिष्ठिर का दूर-दूर तक यश फैला और उनकी सत्ता भली-भांति स्थापित हो गई। 

जब ऐसा प्रतीत होने लगा कि सबकुछ लगभग सामान्य हो चला है, तब भगवान द्वारका जाने के लिए अपने रथ पर सवार हुए। सात्यिकि और उद्धव भी उनके साथ चले।

तभी उत्तरा (अभिमन्यु की पत्नी) दौड़ती हुई भगवान श्रीकृष्ण की ओर आई। वह बहुत घबराई हुई थी। वह  कातर स्वर में भगवान से प्रार्थना करने लगी - हे देवाधिदेव, मेरी रक्षा करें। एक दहकता हुआ लोहे का बाण बहुत तीव्र गति से मेरी ओर बढ़ा चला आ रहा है। मुझे अपने प्राणों की चिंता नहीं है, आप बस मेरे गर्भ की रक्षा कर लें। 

भगवान समझ गए कि अश्वत्थामा ने पांडवों के वंश को समाप्त कर देने के उद्देश्य से ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया है। उन्होंने तत्काल उत्तरा के गर्भ को अपनी माया के कवच से ढक दिया।

उधर उत्तरा के गर्भ में स्थित शिशु जब ब्रह्मास्त्र के प्रचंड तेज से जलने लगा, तभी उसने देखा कि एक अत्यंत तेजस्वी श्याम वर्ण का पुरुष, जिसका आकार एक अंगूठे के बराबर था, उसके सामने उपस्थित हो गया। वह पुरुष पीताम्बरधारी था और उसके चार हाथ थे। वह तीव्र गति से अपनी गदा घुमाता हुआ तब तक शिशु के चारों ओर  चक्कर लगाता रहा जबतक ब्रह्मास्त्र का प्रभाव शांत नहीं हो गया। गर्भस्थ शिशु बार-बार यही सोचता रहा कि यह पुरुष कौन है जो उसकी रक्षा कर रहा है? ब्रह्मास्त्र के निष्क्रिय हो जाने पर वह रहस्यमय पुरुष देखते ही देखते अंतर्धान हो गया। 

यही बालक बाद में परीक्षित नाम से प्रसिद्ध हुआ। वह जिसे भी देखता था, इस बात की परीक्षा करता था कि कहीं यह वही पुरुष तो नहीं है जिसे उसने गर्भस्थ रहते हुए देखा था ?

युधिष्ठिर ने जब अपने पौत्र परीक्षित के भविष्य के बारे में  ज्योतिषियों से जानना चाहा तो उन्होंने कहा - यह शिशु महान वीर, दानी, यशस्वी, धार्मिक, सहनशील, सेवक, प्रजावत्सल, भगवान् श्रीकृष्ण का परम भक्त, पृथ्वी और धर्म की रक्षा करनेवाला होगा। किन्तु कालांतर में, नियतिवश यह एक अनुचित कर्म करेगा और उसके कारण एक तपस्वी के शाप से इसे तक्षक नामक नाग डसेगा। अपने जीवन के अंतिम दिनों में  यह अपनी समस्त धन-संपत्ति एवं सांसारिक आसक्ति त्याग कर भगवान के चरणों की शरण लेगा। उस समय इसे वेदव्यासजी के पुत्र शुकदेवजी द्वारा आत्मा के यथार्थ स्वरूप के बारे में ज्ञान प्राप्त होगा। अंत में, यह अपना शरीर त्यागकर अभयपद प्राप्त करेगा। 


(मूल ग्रन्थ पर आधारित)

(अगले अंक में - भीष्म का देह-त्याग )

श्याम चतुर्वेदी 













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