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तेरह: परीक्षित को ऋषिकुमार द्वारा शाप

एक बार राजा परीक्षित शिकार खेलने के लिए वन में गए। शिकार खेलने में उन्हें समय की सुध न रही। जब उन्हें जोरों की  प्यास सताने लगी तो वे जल की खोज में भटकते हुए ऋषि शमीक के आश्रम पहुँच गए। राजा ने ऋषि को प्रणाम कर उनसे जल के लिए अनुरोध किया। उस समय ऋषि आँखें बंद कर गहरे ध्यान में बैठे हुए थे। उन्हें राजा की उपस्थिति का बिलकुल पता ही नहीं चला। किन्तु, भूख-प्यास से व्याकुल राजा ने ऋषि के इस आचरण से स्वयं को बहुत अपमानित अनुभव किया।  संभवतः यह ऋषि अहंकारवश मेरा स्वागत नहीं करना चाहता है, और इसने जान-बूझकर अपनी ऑंखें बंद कर समाधि का ढोंग रचा है - राजा ने सोचा। भूख-प्यास ने उनका विवेक हर-सा लिया था। क्रोध और अपमान से तिलमिलाए राजा ने तब पास ही पड़े एक मृत साँप को अपने धनुष की नोक से उठाया और उसे ऋषि के गले में डालकर अपनी राजधानी चले गए।  जब राजा परीक्षित का ऋषि शमीक के आश्रम में आगमन हुआ, उस समय ऋषि-पुत्र श्रृंगी अन्य ऋषिकुमारों के साथ खेलने में व्यस्त था। उसे जब राजा के दुर्व्यवहार की सूचना मिली तो उसके क्रोध और दुःख का ठिकाना नहीं रहा। अत्यंत क्षोभ के साथ उसने कहा - इन राजाओं का...

बारह: राजा परीक्षित और कलियुग

राज्याभिषेक के बाद राजा परीक्षित धर्मपूर्वक राज्य का शासन करने लगे। उन्होंने उत्तर की पुत्री इरावती से विवाह किया जिससे उनके जनमेजय सहित चार पुत्र हुए। उन्होंने तीन अश्वमेध यज्ञ किए और दिग्विजय के लिए निकल पड़े। वे जहाँ भी जाते, वहीं लोगों के मुख से अपने पूर्वजों और उन पर भगवान् श्रीकृष्ण की अगाध कृपा का बखान सुनते। इससे भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में उनकी भक्ति दिन पर दिन बढ़ती चली गई।   एक दिन राजा परीक्षित ने एक अत्यंत करुण दृश्य देखा। उनके शिविर से थोड़ी दूरी पर एक बैल खड़ा था। उसका एक ही पैर था। उसके पास ही एक गाय भी खड़ी थी जो बहुत दुर्बल दिखाई देती थी। उन दोनों पशुओं को एक क्रूर पुरुष निर्दयतापूर्वक डंडे और लातों से बराबर मार रहा था। दोनों पशु भय से बुरी तरह कांप रहे थे और असहाय भाव से उसकी मार झेल रहे थे।  यह देखकर राजा परीक्षित को बहुत क्रोध आया। उन्होंने उस निर्दयी पुरुष को ललकार कर पूछा - तू कौन है? तुमने वस्त्र तो राजाओं की तरह पहन रखे हैं किन्तु तेरे कर्म राजाओं-जैसे नहीं हैं। तू बलवान होकर भी इन दुर्बल प्राणियों को क्यों सता रहा है? मेरे राज्य में निरपराधों पर ऐसा...

ग्यारह: भगवान श्रीकृष्ण का महाप्रयाण एवं पांडवों द्वारा गृह-त्याग

राजा युधिष्ठिर ने अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण की कुशलता जानने के लिए द्वारका भेजा था। सात महीने बीत गए। किंतु, अर्जुन जब  हस्तिनापुर नहीं लौटा तो युधिष्ठिर को चिंता होने लगी। इधर कुछ दिनों से उन्हें कई अपशकुन दिखाई देने लगे थे। उन्होंने देखा कि समय की गति उलट-पुलट हो रही है। जिस समय जो ऋतु होनी चाहिए, उस समय वह नहीं होती। प्राकृतिक आपदाओं का प्रकोप बढ़ गया है। समाज की मर्यादाएँ और मूल्य नष्ट हो रहे हैं। प्रजा में अधर्म, लोभ, कपट, द्वेष, असत्य, क्रोध, दम्भ आदि दुर्गुण बढ़ गए हैं। सर्वत्र शोक-संताप की छाया मँडरा रही है।  युधिष्ठिर को एक अज्ञात आशंका घेरने लगी - कहीं वह समय आ तो नहीं गया जब भगवान धरती पर अपनी लीला समेट लेना चाहते हैं? इतने में अर्जुन द्वारका से हस्तिनापुर लौट आया। अर्जुन को देखकर युधिष्ठिर को सहसा अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। अर्जुन को यह क्या हो गया? उसका  शरीर अत्यंत दुर्बल हो गया था। उसके मुख से उसका स्वाभाविक तेज चला गया था। धरती का वह महानतम धनुर्धारी इस समय अपनी आँखों में आँसू भरकर सिर झुकाए चुपचाप खड़ा था।  युधिष्ठिर ने व्यग्र होकर वहां उपस्थित अन्...

दस: विदुर का हस्तिनापुर लौटना और धृतराष्ट्र के साथ गृह-त्याग

 भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारका प्रस्थान करने के कुछ महीनों के बाद विदुर अपनी तीर्थयात्रा पूरी करके हस्तिनापुर लौट आए। (विदुर ने क्यों महाभारत युद्ध में भाग नहीं लिया था और तीर्थयात्रा पर निकल गए थे, यह प्रसंग बाद में आएगा।)  उनके आगमन की सूचना पाते ही धृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती, युयुत्सु, संजय, कृपाचार्य, एवं पांडव-परिवार के सभी नर-नारी प्रसन्नता एवं उत्साह से भरकर उनसे मिलने चल पड़े। ऐसा लगता था जैसे विदुर के आते ही उन सबके शरीर में पुनः प्राण आ गए हों।  भोजन एवं विश्राम के बाद जब विदुर शांति से बैठे तो युधिष्ठिर ने रूंधे स्वर में उनसे कहा - तात! मैं कभी यह भूल  नहीं पाता हूँ की आपने हमें न जाने कितनी विपत्तियों से बचाया। दुर्योधन के द्वारा चाहे वह लाक्षागृह की अग्नि हो या विष देकर हमलोगों को मारने का षड्यंत्र - आपने हमें वैसे ही बचाया जैसे एक चिड़िया अपने पंखों से ढककर अपने अण्डों-बच्चों को बचाती है।  युधिष्ठिर ने फिर पूछा - हम सभी यह जानने को उत्सुक हैं की आपने किन-किन तीर्थों  के दर्शन किये। आप तो द्वारका भी अवश्य गए होंगे। वहां हमारे प्रिय भगवान् श्रीकृष्ण...