तेरह: परीक्षित को ऋषिकुमार द्वारा शाप
एक बार राजा परीक्षित शिकार खेलने के लिए वन में गए। शिकार खेलने में उन्हें समय की सुध न रही। जब उन्हें जोरों की प्यास सताने लगी तो वे जल की खोज में भटकते हुए ऋषि शमीक के आश्रम पहुँच गए। राजा ने ऋषि को प्रणाम कर उनसे जल के लिए अनुरोध किया। उस समय ऋषि आँखें बंद कर गहरे ध्यान में बैठे हुए थे। उन्हें राजा की उपस्थिति का बिलकुल पता ही नहीं चला। किन्तु, भूख-प्यास से व्याकुल राजा ने ऋषि के इस आचरण से स्वयं को बहुत अपमानित अनुभव किया। संभवतः यह ऋषि अहंकारवश मेरा स्वागत नहीं करना चाहता है, और इसने जान-बूझकर अपनी ऑंखें बंद कर समाधि का ढोंग रचा है - राजा ने सोचा। भूख-प्यास ने उनका विवेक हर-सा लिया था। क्रोध और अपमान से तिलमिलाए राजा ने तब पास ही पड़े एक मृत साँप को अपने धनुष की नोक से उठाया और उसे ऋषि के गले में डालकर अपनी राजधानी चले गए। जब राजा परीक्षित का ऋषि शमीक के आश्रम में आगमन हुआ, उस समय ऋषि-पुत्र श्रृंगी अन्य ऋषिकुमारों के साथ खेलने में व्यस्त था। उसे जब राजा के दुर्व्यवहार की सूचना मिली तो उसके क्रोध और दुःख का ठिकाना नहीं रहा। अत्यंत क्षोभ के साथ उसने कहा - इन राजाओं का...