दस: विदुर का हस्तिनापुर लौटना और धृतराष्ट्र के साथ गृह-त्याग

 भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारका प्रस्थान करने के कुछ महीनों के बाद विदुर अपनी तीर्थयात्रा पूरी करके हस्तिनापुर लौट आए। (विदुर ने क्यों महाभारत युद्ध में भाग नहीं लिया था और तीर्थयात्रा पर निकल गए थे, यह प्रसंग बाद में आएगा।)  उनके आगमन की सूचना पाते ही धृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती, युयुत्सु, संजय, कृपाचार्य, एवं पांडव-परिवार के सभी नर-नारी प्रसन्नता एवं उत्साह से भरकर उनसे मिलने चल पड़े। ऐसा लगता था जैसे विदुर के आते ही उन सबके शरीर में पुनः प्राण आ गए हों। 

भोजन एवं विश्राम के बाद जब विदुर शांति से बैठे तो युधिष्ठिर ने रूंधे स्वर में उनसे कहा - तात! मैं कभी यह भूल  नहीं पाता हूँ की आपने हमें न जाने कितनी विपत्तियों से बचाया। दुर्योधन के द्वारा चाहे वह लाक्षागृह की अग्नि हो या विष देकर हमलोगों को मारने का षड्यंत्र - आपने हमें वैसे ही बचाया जैसे एक चिड़िया अपने पंखों से ढककर अपने अण्डों-बच्चों को बचाती है। 

युधिष्ठिर ने फिर पूछा - हम सभी यह जानने को उत्सुक हैं की आपने किन-किन तीर्थों  के दर्शन किये। आप तो द्वारका भी अवश्य गए होंगे। वहां हमारे प्रिय भगवान् श्रीकृष्ण और बाकी  यदुवंशियों का क्या समाचार है?

विदुर ने तब उपस्थित लोगों को अपनी तीर्थयात्रा के सारे विवरण दिए। परन्तु करुणावश यह सोचकर की इससे पांडवों को बहुत कष्ट पहुंचेगा, उन्होंने यदुवंशियों के विनाश की बात छिपा ली। वैसे भी, यह समाचार बहुत शीघ्र हस्तिनापुर पहुँचने ही वाला था। 

पांडवों की प्रसन्नता एवं धृतराष्ट्र के कल्याण के लिए विदुर ने कुछ दिनों तक उनके साथ रहने का निश्चय किया। पांडव उनकी बहुत श्रद्धा पांडव उनकी बहुत श्रद्धा करते थे। युधिष्ठिर भी धर्म एवं नियमपूर्वक राजकाज चला रहे थे। 

ऐसा प्रतीत होता था, जैसे सबकुछ सामान्य भाव से चल रहा हो। किन्तु, विदुर आनेवाले काल की गति जानते थे। एक दिन उन्होंने धृतराष्ट्र से कहा - महाराज, अब वह समय आ गया है जब हमें झटपट यहाँ से निकल जाना चाहिए। आप कब तक इस तरह मोहग्रस्त होकर यहाँ महल में पड़े रहेंगे? आपके सारे प्रियजन मारे जा चुके हैं। आपकी आयु ढल गई है। आपकी इन्द्रियां दुर्बल हो गई हैं। आपका शरीर रोगों का घर बन गया है। फिर भी आपकी जीने की इच्छा कितनी प्रबल है!

धृतराष्ट्र ने विदुर के इस कथन का आशय समझने का प्रयत्न किया। 

विदुर ने कहना जारी रखा - आपने कभी यह सोचा कि अब आप अपने ही घर में पराये हो चुके हैं? भीम द्वारा प्रतिदिन उपेक्षा से डाल दिए गए भोजन को खाकर आप एक कुत्ते-सा जीवन जी रहे हैं। जिन पांडवों को आपने कभी विष देकर, तो कभी अग्नि से जलाकर, मार डालना चाहा था, जिनकी पत्नी को आपने भरी सभा में अपमानित किया था, जिनका आपने अन्यायपूर्वक राज्य और धन छीन लिया था, आज आप उन्हीं की दया पर जीवित हैं! ऐसे निंदनीय जीवन से अपने-आपको मुक्त कीजिए। अब आगे बहुत भयंकर समय आनेवाला है। इसलिए, बिना किसी को बताए हमें यह स्थान शीघ्र ही छोड़ देना चाहिए। 

विदुर की बातों में सच्चाई थी। उन्हें सुनकर धृतराष्ट्र की प्रज्ञा के नेत्र खुल गए। 

जब गांधारी को इस बात का पता चला कि धृतराष्ट्र ने विदुर के साथ महल छोड़कर हिमालय-यात्रा की योजना बना ली है, तो उन्होंने भी उनके साथ चलने का निश्चय किया। 

अगले दिन प्रातःकाल राजा युधिष्ठिर जब संध्यावंदन के बाद गुरुजनों की चरणवंदना के लिए निकले तो महल में विदुर, धृतराष्ट्र और गांधारी को नहीं पाकर उन्हें बड़ी चिंता हुई। उन्होंने उनके सेवक संजय से पूछा, किन्तु उसे भी इसकी कोई जानकारी नहीं थी। पता नहीं, वे अभी कहाँ और किस स्थिति में होंगे, युधिष्ठिर ने सोचा।  

तभी देवर्षि नारदजी वहाँ पधारे। युधिष्ठिर की चिंता जानकर नारदजी बोले - युधिष्ठिर, किसी के लिए शोक करने का कोई लाभ नहीं है। हमारा मिलना-बिछुड़ना सब कुछ ईश्वर की इच्छा से होता है। उस पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है। कौन किसकी रक्षा कर सकता है! जो बिना हाथवाले हैं, वे हाथवालों का भोजन हैं। जिनके पैर नहीं हैं, वे चार पैर वालों का भोजन हैं। निर्बल सबल का भोजन है। इस प्रकार एक जीव अपने जीवन के लिए दूसरे जीव पर निर्भर करता है। 

जहाँ तक धृतराष्ट्र एवं अन्य लोगों का प्रश्न है - नारदजी बोले - वे सभी हिमालय के दक्षिणी भाग में स्थित सप्तस्रोत के पास एक आश्रम में निवास कर रहे हैं। भगवान का निरंतर ध्यान करने से धृतराष्ट्र के समस्त दोष दूर हो जाएँगे। आज से पाँचवे दिन धृतराष्ट्र और गांधारी योग की अग्नि में भस्म हो जाएँगे। उनकी ऐसी गति देखकर विदुर को एक साथ विषाद और हर्ष दोनों की अनुभूति होगी और वे तीर्थयात्रा के लिए निकल पड़ेंगे। 

नारदजी की बातों से युधिष्ठिर को बड़ी सांत्वना मिली। नारदजी ने भी वहाँ से प्रस्थान किया। 










 

टिप्पणियाँ

  1. यह लेख बहुत अच्छा और भावपूर्ण है। विदुर जी की बातें, धृतराष्ट्र का बदलाव और नारद मुनि की सीख — सब कुछ दिल को छू गया। इससे जीवन में धर्म, सच्चाई और त्याग का महत्व समझ में आता है।आपको धन्यवाद, इतनी अच्छी बात हम तक पहुँचाने के लिए। 🙏

    जवाब देंहटाएं
  2. सर हमें आप पर बहुत गर्व है और हम आशा करते हैं कि आप हमेशा इसी तरह आगे बढ़ते रहें।पवित्र श्रीमद भगवद गीता 'जीवन बदलने वाले मार्ग' के प्रति आपकी कड़ी मेहनत और समर्पण बहुत आगे तक जाए।
    आपकी गीता ज्ञान के लिए बहुत बहुत धन्यवाद
    सादर 🙏

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सात: अश्वत्थामा का जघन्य कर्म एवं अर्जुन द्वारा दंड

नौ: भीष्म का देह-त्याग

चौदह: शुकदेवजी का आगमन