ग्यारह: भगवान श्रीकृष्ण का महाप्रयाण एवं पांडवों द्वारा गृह-त्याग

राजा युधिष्ठिर ने अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण की कुशलता जानने के लिए द्वारका भेजा था। सात महीने बीत गए। किंतु, अर्जुन जब  हस्तिनापुर नहीं लौटा तो युधिष्ठिर को चिंता होने लगी। इधर कुछ दिनों से उन्हें कई अपशकुन दिखाई देने लगे थे। उन्होंने देखा कि समय की गति उलट-पुलट हो रही है। जिस समय जो ऋतु होनी चाहिए, उस समय वह नहीं होती। प्राकृतिक आपदाओं का प्रकोप बढ़ गया है। समाज की मर्यादाएँ और मूल्य नष्ट हो रहे हैं। प्रजा में अधर्म, लोभ, कपट, द्वेष, असत्य, क्रोध, दम्भ आदि दुर्गुण बढ़ गए हैं। सर्वत्र शोक-संताप की छाया मँडरा रही है। 

युधिष्ठिर को एक अज्ञात आशंका घेरने लगी - कहीं वह समय आ तो नहीं गया जब भगवान धरती पर अपनी लीला समेट लेना चाहते हैं?

इतने में अर्जुन द्वारका से हस्तिनापुर लौट आया। अर्जुन को देखकर युधिष्ठिर को सहसा अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। अर्जुन को यह क्या हो गया? उसका  शरीर अत्यंत दुर्बल हो गया था। उसके मुख से उसका स्वाभाविक तेज चला गया था। धरती का वह महानतम धनुर्धारी इस समय अपनी आँखों में आँसू भरकर सिर झुकाए चुपचाप खड़ा था। 

युधिष्ठिर ने व्यग्र होकर वहां उपस्थित अन्य सुहृदों के सामने ही उससे पूछा - भाई, द्वारका में सब कुशल तो है? तुम स्वयं तो कुशल हो? तुम्हारा मुख इतना श्रीहीन क्यों है? कहीं तुमसे ऐसा तो कोई कार्य नहीं हो गया जो सामाजिक या धार्मिक मर्यादा के विरुद्ध हो? ... या, कहीं ऐसा तो नहीं कि तुमने अपने परममित्र भगवान श्रीकृष्ण को खो दिया हो?

अर्जुन पहले से ही विषादग्रस्त था। युधिष्ठिर के प्रश्नों ने उसका रहा-सहा धैर्य भी समाप्त कर दिया। वह बार-बार भगवान् श्रीकृष्ण का नाम लेते हुए उन्हें स्मरण करने लगा। फिर उसने अपने आँसू पोछे और अवरुद्ध कंठ  से बोलने लगा - महाराज, मेरा घनिष्ठ मित्र बनकर श्रीकृष्ण ने मुझे ठग लिया। आज तक जिसे मैं अपना पराक्रम समझता था, वह मेरा पराक्रम था ही नहीं। जितने युद्ध हमने जीते, जितनी आपदाओं से हमारी रक्षा हुई, वह सब कुछ भगवान श्रीकृष्ण का ही प्रभाव था। अब वे ही श्रीकृष्ण हम सब को  छोड़कर अपने धाम जा चुके हैं। उनके जाने के बाद मेरी सारी शक्तियाँ भी नष्ट हो गई हैं।

यह कहकर अर्जुन चुप हो गया। फिर उसने एक लम्बी साँस लेकर कहा - भगवान की रानियों को मैं अपने संरक्षण में लेकर द्वारका से चला था, किन्तु रास्ते में ही दुष्ट गोपों ने उन्हें मुझसे लूट लिया। उस समय भी मेरा वही गांडीव था, वही बाण थे, वही रथ था, वही घोड़े थे; मैं भी वही अर्जुन था जिसके सामने  कभी बड़े-बड़े राजा सिर झुकाया करते थे। किन्तु, श्रीकृष्ण के बिना ये सारे उसी तरह निष्फल हो गए जैसे भस्म में डाली हुई आहूति, कपट से भरी हुई सेवा या ऊसर भूमि में डाले हुए बीज नष्ट हो जाते हैं। 

राजन! - अर्जुन बोला - जहाँ तक द्वारकावासियों का प्रश्न है, उनमें से अधिकांश लोग गुरुजनों के शापवश आपस में ही लड़कर नष्ट हो चुके हैं। अब दैवी प्रयोजनवश कुछ ही बचे रह गए हैं। यह भगवान की लीला ही तो है - संसार के प्राणी कभी तो एक-दूसरे का पालन करते हैं, और कभी एक-दूसरे को मार भी डालते हैं। पहले तो भगवान ने शक्तिशाली यदुवंशियों द्वारा अन्य दुष्ट राजाओं का संहार कराया, फिर जब उनकी दुष्टता बढ़ने लगी तो उन्हें भी आपस में लड़ाकर पृथ्वी का भार उतार दिया। 

इस तरह भगवान की लीला का वर्णन करते-करते अर्जुन को गीता का पुनः स्मरण हो आया। भगवान के उपदेशों का ध्यान करके उसका चित्त स्थिर हो गया। 

जैसे कोई एक कांटे से दूसरा कांटा निकालता हो, और फिर उसके निकल जाने पर पहला कांटा भी फेक देता हो, उसी तरह भगवान श्रीकृष्ण ने अपने जिस मानव- शरीर से धरती का भार उतारा था, उसे भी त्याग दिया। 

अर्जुन के द्वारा भगवान श्रीकृष्ण के धरती से विदा होने का समाचार सुनकर युधिष्ठिर ने नए युग के आगमन का संकेत समझ लिया। अब इस नए काल में उनकी कोई भूमिका नहीं रह गई थी। उन्होंने अपने पौत्र परीक्षित को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया और मथुरा में भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध के पुत्र वज्र को वहाँ का राज्य सौंप दिया। फिर तपस्वियों का वेश धारण कर, ममता और अहंकार के सारे बंधन तोड़कर, बिना किसी की प्रतीक्षा किए, एक बहरे व्यक्ति की तरह बिना किसी की बात सुने भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए उत्तर दिशा की ओर चल पड़े। 

युधिष्ठिर को इस तरह जाते देखकर उनके चारों भाई भी उनके साथ हो लिए। भगवान श्रीकृष्ण के निरंतर स्मरण से पांचों पांडवों, माता कुंती और द्रौपदी - सबकी बुद्धि निर्मल हो गई। 

उधर तीर्थयात्रा पर निकले विदुर ने भी प्रभास क्षेत्र में अपने शरीर को त्याग दिया। 

(मूल ग्रंथ पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 













 श्रीकृष्ण 

टिप्पणियाँ

  1. Atayant Sunder Prasang isse hume ye Sikh milti he ki sab kuch bhagwan ke adhin wohi swami he jinke hath me sabki bagdor he.
    Jai shree Ram
    Jai shree Narayan

    जवाब देंहटाएं
  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं
  3. यही जीवन काल चक्र है ! इस संसार का अस्तित्व आप के जीवन से जुड़ा हुआ है और वो तभी तक ऊर्जावान है जब तक आप है!
    आप की ऊर्जा द्वारा निकट सभी का जीवन प्रभावित होता है! इसी को संगत का प्रभाव कहा गया है!
    जय श्री राम 🙏

    जवाब देंहटाएं
  4. कैसे हम केवल अपना अहंकार हैं, यदि हृदय में आत्मा के स्वरूप का हर पल स्मरण रखकर कार्य न किया गया हो।
    और अहंकार तो केवल एक मिथ्या है — मस्तिष्क में एक प्रक्षेपण…
    यह विचार पढ़कर मन में आया।
    साधुवाद आपको 🙏

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सात: अश्वत्थामा का जघन्य कर्म एवं अर्जुन द्वारा दंड

नौ: भीष्म का देह-त्याग

चौदह: शुकदेवजी का आगमन