बारह: राजा परीक्षित और कलियुग
राज्याभिषेक के बाद राजा परीक्षित धर्मपूर्वक राज्य का शासन करने लगे। उन्होंने उत्तर की पुत्री इरावती से विवाह किया जिससे उनके जनमेजय सहित चार पुत्र हुए। उन्होंने तीन अश्वमेध यज्ञ किए और दिग्विजय के लिए निकल पड़े। वे जहाँ भी जाते, वहीं लोगों के मुख से अपने पूर्वजों और उन पर भगवान् श्रीकृष्ण की अगाध कृपा का बखान सुनते। इससे भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में उनकी भक्ति दिन पर दिन बढ़ती चली गई।
एक दिन राजा परीक्षित ने एक अत्यंत करुण दृश्य देखा। उनके शिविर से थोड़ी दूरी पर एक बैल खड़ा था। उसका एक ही पैर था। उसके पास ही एक गाय भी खड़ी थी जो बहुत दुर्बल दिखाई देती थी। उन दोनों पशुओं को एक क्रूर पुरुष निर्दयतापूर्वक डंडे और लातों से बराबर मार रहा था। दोनों पशु भय से बुरी तरह कांप रहे थे और असहाय भाव से उसकी मार झेल रहे थे।
यह देखकर राजा परीक्षित को बहुत क्रोध आया। उन्होंने उस निर्दयी पुरुष को ललकार कर पूछा - तू कौन है? तुमने वस्त्र तो राजाओं की तरह पहन रखे हैं किन्तु तेरे कर्म राजाओं-जैसे नहीं हैं। तू बलवान होकर भी इन दुर्बल प्राणियों को क्यों सता रहा है? मेरे राज्य में निरपराधों पर ऐसा अत्याचार करनेवाला तू निश्चय ही वध के योग्य है।
राजा ने फिर बैल से पूछा - आप तो चार पैर वाले जीव हैं। आपके बाकी तीन पैर किसने काट डाले? मुझे आप सामान्य बैल नहीं प्रतीत होते। कहीं बैल के रूप में आप कोई देवता तो नहीं हैं? आपकी यह दुरवस्था कैसे हो गई?
बैल ने उत्तर दिया - राजन! आपने पांडवों के वंशज के अनुरूप ही वचन कहे हैं। किन्तु मुझे समझ में नहीं आता कि मैं अपने दुःख का क्या कारण बताऊँ! शास्त्रों में भी इस बात पर मतभेद है कि दुःख का वास्तविक कारण क्या होता है। कोई कहता है कि अपने दुखों के लिए हम स्वयं ही उत्तरदायी हैं। कुछ शास्त्र दैवी शक्तियों को इसके लिए दायी ठहराते हैं। कुछ तो यह भी मानते हैं कि दुःख का कारण न तो तर्क द्वारा बताया जा सकता है न ही वाणी द्वारा। इसलिए, हे राजन, आप स्वयं निश्चित करें कि इनमें से कौन-सा मत सही है।
परीक्षित ने कहा - मैं समझ गया। वृषभ के रूप में आप साक्षात् धर्म ही हैं।भला इतनी गंभीर बातें और कौन कह सकता है! सत्ययुग में आपके चार पैर थे - तप, शुचिता, दया और सत्य। समय के साथ अधर्म के अंश गर्व, आसक्ति और मद के प्रभाव से आपके तीन पैर नहीं रहे। अब केवल सत्य ही बचा रह गया है जिसके बल पर आप किसी तरह खड़े हैं। यह क्रूर पुरुष अवश्य ही कलियुग है जो आपके इस पैर को भी नष्ट कर देना चाहता है। और, यह गोमाता साक्षात् पृथ्वी हैं जो भगवान् श्रीकृष्ण के जाने के बाद कलियुग के अत्याचार झेलने को विवश हो गई हैं। आपलोगों को सतानेवाले इस कलियुग को मैं अब जीवित नहीं छोड़ूँगा।
ऐसा कहकर राजा परीक्षित ने अपनी तलवार निकाल ली और कलियुग को मारने के लिए आगे बढ़े। अपनी मृत्यु को सामने देखकर भयभीत कलियुग ने तुरंत अपने सारे राजसी परिधान और राजचिह्न उतार फेंके और अपने प्राणों की भिक्षा माँगता हुआ परीक्षित के चरणों में गिर पड़ा। परीक्षित ने उसे ऐसा करते देखकर हँसते हुए-से कहा - तेरे कर्म बहुत नीच हैं। किन्तु, इस समय तू मेरी शरण में आ गया है, इसलिए मैं तुझे नहीं मारूँगा। साथ ही, यह भी स्पष्ट है कि तू मेरे राज्य में नहीं रह सकता। मेरा राज्य केवल धर्म और सत्य का निवासस्थान है।
कलियुग ने राजा से प्रार्थना की - सार्वभौम! मैं फिर कहाँ जाऊँ? मैं तो जहाँ भी जाने का विचार करता हूँ, वहीं आपको धनुष-बाण चढ़ाए अपने सामने देखता हूँ। अब आप ही बताएँ कि मैं कहाँ रहूँ?
कलियुग की प्रार्थना सुनकर परीक्षित ने कुछ विचारा और उसे रहने के लिए चार स्थान दिए - द्युत (जुआ), मद्यपान,अवैध स्त्रीसंग और हिंसा। ये क्रियाऍं क्रमशः असत्य, मद, आसक्ति और निर्दयता से उत्पन्न होती हैं।
कलियुग को इतने से संतोष नहीं हुआ। उसने राजा से अपने रहने के लिए कुछ और स्थान माँगे। परीक्षित ने तब उसे एक और स्थान दिया - अधर्म से उपार्जित धन भी तुम्हारा निवासस्थान होगा।
इस प्रकार कलियुग के ये पाँच स्थान हो गए। आत्मकल्याण चाहनेवाले पुरुषों को, विशेषकर धर्मपरायण शासकों, प्रजागण के नेताओं और धर्मोपदेशक गुरुओं को इन पाँच स्थानों से सदा दूर रहना चाहिए।
इसके बाद राजा परीक्षित ने धर्म के बाकी तीनों टूटे हुए पैरों - तप, पवित्रता और दया - को पुनः जोड़ दिया। उन्होंने पृथ्वी को भी अभयदान दिया।
जबतक राजा परीक्षित का शासन रहा, कलियुग सिर नहीं उठा सका। कलियुग का यह स्वभाव है कि वह धीर और धर्मपरायण पुरुषों से भयभीत रहता है, किन्तु, प्रमादी पुरुषों पर भेड़िये की तरह टूट पड़ता है।
(मूल ग्रन्थ पर आधारित)
श्याम चतुर्वेदी
( अगले अंक में - राजा परीक्षित को ऋषिकुमार द्वारा शाप)
अति सुन्दर वर्णन 🙏
जवाब देंहटाएंBhagwat ek sampoorna satya or varnan ati sundar tarike se kiya gaya hai.
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