सोलह: विदुरजी ने युद्ध में भाग क्यों नहीं लिया?

राजा परीक्षित ने शुकदेवजी से अनुरोध किया - प्रभो! आप कृपया हमें महात्मा विदुरजी का चरित्र सुनायें। उन्होंने क्यों अपना सुख-सुविधापूर्ण घर-बार छोड़ दिया और तीर्थयात्रा पर निकल गये? तीर्थयात्रा के समय उनकी भेंट किन-किन महात्माओं से हुई और उनमें क्या बातें हुईं?

शुकदेवजी बोले - हे राजन! धृतराष्ट्र पुत्र-प्रेम में अंधा था। वह नीति-अनीति में भेद करने की क्षमता खो चुका था। उसने पांडवों को लाक्षागृह में आग लगाकर मार देना चाहा। उसने भरी सभा में उनकी पत्नी द्रौपदी को अपमानित करने से भी अपने पुत्रों को नहीं रोका। उसने अन्याय से पांडवों का सारा राज्य द्यूत में जीतकर उन्हें वनवास दे दिया।

पाण्डु पुत्रों ने धृतराष्ट्र का सारा अन्याय धैर्य के साथ सहा। वन से लौटने के  बाद जब उन्होंने धृतराष्ट्र से अपना न्यायोचित राज्य माँगा तो धृतराष्ट्र ने उन्हें वह नहीं दिया। यहाँ तक कि जब भगवान श्रीकृष्ण पांडवों का दूत बनकर शांति प्रस्ताव लेकर धृतराष्ट्र की राजसभा में गए, तब भी उसकी बुद्धि नहीं खुली। भगवान का प्रस्ताव सभी के हित में था, किन्तु धृतराष्ट्र ने उसका सम्मान नहीं किया। वह करता भी कैसे, उसके सारे पुण्य तो बहुत पहले क्षीण हो गए थे!

धृतराष्ट्र मूर्ख न था। क्योंकि, अपनी मूर्खताओं के संभावित दुष्परिणाम के प्रति वह सजग था। कौरवों के आसन्न नाश की आशंका ने उसे अशांत कर दिया। उसने सलाह के लिए विदुरजी को अपनी सभा में बुलाया। वहाँ कर्ण और शकुनि के साथ दुर्योधन भी पहले से उपस्थित था।

धृतराष्ट्र के द्वारा यह पूछे जाने पर कि तत्कालीन परिस्थिति में उसे क्या करना चाहिए, विदुरजी ने स्पष्ट स्वर में यह उत्तर दिया - महाराज! अबतक आपके सारे असहनीय अपराधों को अजातशत्रु महात्मा युधिष्ठिर ने धैर्यपूर्वक सहा है। अब आप उन्हें उनका हिस्सा दे दीजिए।  

विदुरजी ने आगे कहा - आप थोड़ा विचार करें, इस समय सारी परिस्थितियाँ आपके प्रतिकूल हैं। आप जिस भीम से इतना डरते हैं, वह भीम अपने भाइयों सहित भीषण प्रतिशोध की भावना से नाग की तरह फुफकार रहा है। पांडवों को स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का संरक्षण प्राप्त है। इस पृथ्वी के बड़े-बड़े राजाओं का बल एवं मनीषियों और देवताओं का आशीर्वाद भी पांडवों के ही साथ है।

विदुरजी ने फिर दुर्योधन की ओर संकेत करके कहा - आपके पुत्र दुर्योधन के रूप में साक्षात आपका दुर्भाग्य ही आपके घर में आ बैठा है। वह अपनी मूर्खतावश भगवान श्रीकृष्ण से द्वेष करता है! और, सदैव उसका समर्थन करने के कारण आप भी श्रीहीन हो गए हैं। यदि आप अपने कुल का कल्याण चाहते हैं तो अपने इस दुष्ट पुत्र का तुरन्त त्याग कर दीजिए।

विदुरजी के ये वचन सत्य और नीतिसंगत थे। किन्तु, वे कठोर भी थे। उन्हें सुनकर दुर्योधन को अत्यन्त क्रोध आया। उसने चिल्लाते हुए कहा - इस दासी-पुत्र को किसने यहाँ बुलाया? इसकी नीचता देखो- यह हमारे टुकड़ों पर पलता है और हमारे शत्रुओं का पक्ष लेता है! इसके अपराध के लिए इसे हम मारेंगे तो नहीं, किन्तु इसे इसी क्षण हमारे नगर से बाहर निकाल दिया जाए!

दुर्योधन के अशिष्ट वचनों से विदुरजी तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने धृतराष्ट्र की ओर देखा। धृतराष्ट्र के मुँह से जब दुर्योधन के विरोध में एक शब्द तक नहीं निकला तो वे समझ गए कि अब वहाँ उनकी कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई। 

भगवान की माया की चाल को कोई नहीं समझ सकता - विदुरजी ने अपना सिर हिलाते हुए सोचा।

फिर उन्होंने बिना कोई विलंब किए अपना धनुष राजद्वार पर रख दिया और हस्तिनापुर से निकल गए।

(मूल ग्रंथ पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 

टिप्पणियाँ

  1. विदुर सबके शरीर में हैं, लेकिन शरीर में स्थित मजबूत धृतराष्ट्र उनकी बात मानने नहीं देता और परिणाम सबको जगजाहिर है।

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  2. बहुत सुंदर तरीके से व्याख्या की हे अति सुंदर .

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