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इक्कीस: हिरण्याक्ष का वध

दिति के गर्भ से हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के जन्म लेते ही तीनों लोकों में हजारों अशुभ संकेत प्रकट होने लगे। पृथ्वी और पर्वत काँपने लगे। समुद्र अशांत हो गया। देव-मूर्तियों की आँखों से आँसू बहने लगे। आँधी के बिना ही वृक्ष उखड़-उखड़ कर गिरने लगे। बादल कहीं नहीं थे, किन्तु उनका घोर गर्जन हर तरफ सुनाई देता था। गुफाओं से रथ के चलने की-सी घरघराहट सुनाई देने लगी। भयभीत पक्षी अपने घोंसले से निकल कर इधर-उधर उड़ने लगे।  देखते-ही-देखते दोनों भाई बड़े होने लगे। उनका शारीरिक बल असाधारण था। हिरण्याक्ष को युद्ध का बहुत चाव था। एक दिन वह अपने बराबर योद्धा खोजता हुआ हाथ में गदा लेकर स्वर्गलोक जा पहुँचा। उसे देखते ही इन्द्र समेत सारे देवता भयभीत हो कर इधर-उधर छिप गए। हिरण्याक्ष ने बार-बार गर्जना कर देवताओं को युद्ध की चुनौती दी। किन्तु, किसी में भी उसकी चुनौती स्वीकार करने का साहस नहीं था। देवताओं की कायरता से निराश होकर हिरण्याक्ष समुद्र की ओर चल पड़ा जहाँ वरुण की राजधानी विभावरीपुरी थी। वरुण पाताल-लोक और वहाँ रहने वाले जलचरों का स्वामी था।  हिरण्याक्ष ने व्यंग्य से वरुण को कहा  - महाराज, ...

बीस: हिरण्याक्ष का जन्म

मैत्रेय ने कहा - दिति के दो पुत्र हुए - हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु। उनके जन्म की कथा इस प्रकार है - एक बार ब्रह्मा के मानस-पुत्र सनकादि मुनि भगवान के दर्शन की अभिलाषा से वैकुण्ठ लोक पहुँचे। वे मुनि आयु और ज्ञान में यद्यपि बहुत बड़े थे, किन्तु वे सदा पाँच वर्ष के बच्चों की तरह दिखाई पड़ते थे। दिशाएँ ही उनका वस्त्र थीं। वे दिगंबर थे।  वैकुण्ठ के छह द्वारों को पार कर जब वे सातवें द्वार पर पहुँच तो वहाँ उन्हें जय और विजय नामक दो द्वारपाल मिले। उन्होंने मुनियों का वास्तविक स्वरूप नहीं पहचाना और उन्हें साधारण बालक समझकर अपने डंडों से द्वार पर ही रोक दिया। मुनियों का अद्भुत तेज देखकर भी  उनके मन में श्रद्धा का भाव नहीं आया। मुनियों को उन द्वारपालों के इस विचित्र एवं उद्दंड व्यवहार से बड़ा आश्चर्य और क्रोध हुआ। उन्होंने कहा - भगवान और उनके भक्तों के बीच क्या बाधा हो सकती है? वैकुण्ठ में तो प्रत्येक निवासी भगवान विष्णु की तरह ही गुणों वाला होता है। फिर तुम दोनों हमें इस तरह रोकने वाले कौन हो? तुममें अभी भी एक वैकुण्ठ-निवासी होने के गुण नहीं हैं। इसलिए तुम लोगों के कल्याण के लिए यही उचित...

उन्नीस: भगवान का वराह-अवतार एवं हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के जन्म की कथा (भाग-1)

मैत्रेय ने कहा- ब्रह्मा के शरीर के दो भागों से मनु और शतरूपा का आविर्भाव हुआ। मनु ने विनम्रता से हाथ जोड़कर ब्रह्मा से पूछा  -  हे जगत के पिता! हमारे लिए आपका क्या आदेश है? हम क्या करें जिससे इस लोक में हमारा यश हो और परलोक में भी सद्गति मिले? ब्रह्मा ने प्रसन्नता से कहा- हे वीर! पिता के प्रति तुम्हारा यह सम्मान और समर्पण प्रशंसनीय है। अभी तुम्हारा यही कर्तव्य है कि तुम शतरूपा के सहयोग से अपनी तरह ही गुणों वाली संतति उत्पन्न करो और पृथ्वी पर सृष्टि का विस्तार करो।  फिर अपनी प्रजा का धर्मपूर्वक पालन करो।  मनु ने कहा  - हे पिताजी, आपकी आज्ञा शिरोधार्य है। किन्तु, हमें इस समय हमारे एवं हमारी भावी प्रजा के रहने के लिए कोई स्थान नहीं दिखाई देता। समस्त पृथ्वी तो जल में डूबी हुई है।  मनु की बात सुनकर ब्रह्मा सोच में पड़ गए कि पृथ्वी का उद्धार कैसे हो। यह काम इतना कठिन था कि इसे सर्वशक्तिमान भगवान के सिवाय और कोई नहीं कर सकता था।  जब ब्रह्मा यह सोच रहे थे, तभी उनकी नाक के एक छिद्र से अँगूठे के बराबर एक वराह (सूअर) निकल आया। उसने देखते-ही-देखते अपना विस्तार पर्...

अठारह: विदुर-मैत्रेय संवाद

उद्धव के जाने के बाद विदुर भी यमुना-तट से चलकर कुछ दिनों में गंगा के किनारे (हरिद्वार) पहुँचे जहाँ उनकी मैत्रेय से भेंट हुई।  वार्तालाप के दौरान विदुर ने कई विषयों पर चर्चा की। उन्होंने जब जगत की उत्पत्ति के बारे में जिज्ञासा की तो मैत्रेय ने कहा - सृष्टि के पहले संपूर्ण जगत जल में डूबा हुआ था और उसमें समस्त जीवों को उनके सूक्ष्म रूप में अपने भीतर समेटे अजन्मा, सर्वशक्तिमान, आत्मानंद नारायण लीन थे।  कई युग बीत जाने पर जब सृष्टि का समय आया तो भगवान की नाभि से एक कमल विकसित हुआ जिसमें से ब्रह्मा प्रकट हुए। बिना किसी भौतिक पिता के उत्पन्न होने के कारण ब्रह्मा का एक नाम स्वयंभू (स्वयं जन्म लेने वाला) भी है। कमल में स्थित ब्रह्मा को जब कोई लोक नहीं दिखाई दिया तो उन्होंने अपने चारों तरफ सिर घुमाया। इससे उनके चार सिर हो गए। वे बार-बार सोचने लगे  - मैं कौन हूँ? इस कमल का उद्गम कहाँ है? फिर वे समाधि में लीन हो गए। अपनी समाधि में उन्होंने सर्वशक्तिमान भगवान के दर्शन किए। उनकी प्रेरणा से उन्होंने सृष्टि का काम आरंभ किया। नए युग की सृष्टि का काम आसान नहीं था। जब ब्रह्मा ने सृष्टि करन...