उन्नीस: भगवान का वराह-अवतार एवं हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के जन्म की कथा (भाग-1)

मैत्रेय ने कहा- ब्रह्मा के शरीर के दो भागों से मनु और शतरूपा का आविर्भाव हुआ। मनु ने विनम्रता से हाथ जोड़कर ब्रह्मा से पूछा  -  हे जगत के पिता! हमारे लिए आपका क्या आदेश है? हम क्या करें जिससे इस लोक में हमारा यश हो और परलोक में भी सद्गति मिले?

ब्रह्मा ने प्रसन्नता से कहा- हे वीर! पिता के प्रति तुम्हारा यह सम्मान और समर्पण प्रशंसनीय है। अभी तुम्हारा यही कर्तव्य है कि तुम शतरूपा के सहयोग से अपनी तरह ही गुणों वाली संतति उत्पन्न करो और पृथ्वी पर सृष्टि का विस्तार करो।  फिर अपनी प्रजा का धर्मपूर्वक पालन करो। 

मनु ने कहा  - हे पिताजी, आपकी आज्ञा शिरोधार्य है। किन्तु, हमें इस समय हमारे एवं हमारी भावी प्रजा के रहने के लिए कोई स्थान नहीं दिखाई देता। समस्त पृथ्वी तो जल में डूबी हुई है। 

मनु की बात सुनकर ब्रह्मा सोच में पड़ गए कि पृथ्वी का उद्धार कैसे हो। यह काम इतना कठिन था कि इसे सर्वशक्तिमान भगवान के सिवाय और कोई नहीं कर सकता था। 

जब ब्रह्मा यह सोच रहे थे, तभी उनकी नाक के एक छिद्र से अँगूठे के बराबर एक वराह (सूअर) निकल आया। उसने देखते-ही-देखते अपना विस्तार पर्वत के समान कर लिया। उसके प्रचंड तेज और गर्जना से सारे लोक काँप गए। पृथ्वी के उद्धार के लिए भगवान का वराह-अवतार हो चुका था!

फिर भगवान ने बड़े वेग के साथ जल में प्रवेश किया। जल के भीतर पड़ी पृथ्वी पर हिरण्याक्ष ने अपना अधिकार जमा लिया था। उसने जब भगवान को युद्ध की चुनौती दी तो उन्होंने उसका वध कर दिया और पृथ्वी को जल से बाहर ले आए। 

यह सुनकर विदुर ने अनुरोध किया  - मुनिवर! भगवान द्वारा पृथ्वी के उद्धार की कथा कृपया विस्तार से बताएँ।  हिरण्याक्ष कौन था? उसने भगवान से युद्ध क्यों किया?

मैत्रेय ने कहा - मैं हिरण्याक्ष के जन्म की कथा सुनाता हूँ। एक बार दक्ष-पुत्री दिति ने अपने पति कश्यप से यह प्रार्थना की - हे विद्वन्! अपनी सौतों को पुत्रवती देखकर आज मेरी भी संतान पाने की इच्छा बहुत बलवती हो गई है। मैं अब और प्रतीक्षा नहीं कर सकती। 

उस समय संध्या-काल था। कश्यप सायंकालीन उपासना के लिए बैठे थे। उन्होंने अपनी पत्नी को समझाते हुए कहा - हे गृहस्वामिनी! तुम्हारी भी संतान अवश्य होगी। पत्नी की इच्छा-पूर्ति करना पति का धर्म होता है। क्योंकि, गृहस्थ आश्रम में पत्नी के सहयोग से ही पति अपने सारे कर्तव्यों के पालन करने का समय और सामर्थ्य पाता है। पत्नी उसे कुमार्ग पर जाने से बचाती है। किन्तु, इस समय तुम थोड़ा धैर्य धरो। गर्भाधान के लिए संध्या-काल शुभ नहीं होता। इस समय भगवान रुद्र अपने सहचरों भूत-प्रेतों के साथ विचरण करते हैं। कोई भी अशुभ आचरण उनकी दृष्टि से छिपा नहीं रह सकता। 

किन्तु, दिति अपनी इच्छा के अधीन होकर सही-गलत की समझ खो चुकी थी। कश्यप के लाख समझाने पर भी उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। 

तब ' दैव की जैसी इच्छा ' सोचकर विवश कश्यप ने अपनी पत्नी के दुराग्रह को मान लिया। फिर स्नान कर वे सांध्योपासना में लग गए।  

उधर भावना के क्षणिक आवेश में अपना नियंत्रण खो देने के कारण दिति को बहुत ग्लानि हुई। वह अपने पति के पास गई और सिर नीचा कर कहने लगी - हे स्वामी, मैं आपकी और भगवान रुद्र की अपराधिणी हूँ। मुझे क्षमा करें। मुझे भय है कि भगवान रुद्र के कोप से कहीं मेरा गर्भ नष्ट न हो जाए..! 

कश्यप ने अपनी दृष्टि उठा कर देखा  - दिति भय और अपराधबोध से थर-थर काँप रही थी। उन्होंने कहा  - अमंगलकारी स्त्री! गर्भाधान के लिए तुम्हारा दुराग्रह हर तरह से अनुचित था। इसके चार कारण थे - उस समय तुम्हारा मन काम-वासना से मलिन था, वह मुहूर्त शुभ नहीं था, तुमने अपने पति की बात नहीं मानी और तुमने देवताओं का भी आदर नहीं किया। अब इसका परिणाम यह होगा कि तुम्हारी कोख से दो बड़े ही अधम और अशुभ पुत्र जन्म लेंगे। उनके अत्याचारों से पृथ्वी काँप उठेगी। उनके हाथों अनगिनत निरपराध लोग मारे जाएँगे, स्त्रियों पर अत्याचार होगा और महात्माओं का क्षोभ बढ़ेगा। उस समय भगवान को स्वयं अवतार लेना होगा। तुम्हारे पुत्रों को मार कर वे जगत का कल्याण करेंगे। 

कश्यप की बात सुनकर दिति सन्न रह गई। कुछ देर बाद उसने धीरे-से कहा - मैं और क्या कहूँ..? मैं तो अब बस इतने से ही संतोष कर सकती हूँ कि भगवान के हाथों मेरे पुत्रों की मृत्यु होगी, इसी में उनका भी कल्याण होगा। 

फिर वह चुप हो गई।

कश्यप ने देखा कि दिति का चित्त उसके पश्चाताप की अग्नि में शुद्ध हो गया है। तब उन्होंने कोमल स्वर में उससे कहा  - हे देवि! तुम्हें अपने किए पर शोक और पश्चाताप हुआ। तुम्हें उचित-अनुचित का ज्ञान भी हो गया। और, तुमने भगवान विष्णु, शिव और मेरे प्रति अपना आदर भी दिखाया। इसलिए, तुम्हारे इन दोनों पुत्रों में से एक का ऐसा पुत्र होगा जो भगवान का महान भक्त होगा।  वह विषयों में अनासक्त, शीलवान, सर्वगुणसंपन्न, दूसरों के सुख में सुखी और दुख में दुखी होनेवाला होगा। सारे महापुरुष उसके गुण गायेंगे। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर साक्षात भगवान उसे दर्शन देंगे।

कश्यप की बातों से दिति को बहुत सांत्वना मिली।  

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)

(अगले अंक में - हिरण्याक्ष का जन्म)

श्याम चतुर्वेदी 




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