अठारह: विदुर-मैत्रेय संवाद

उद्धव के जाने के बाद विदुर भी यमुना-तट से चलकर कुछ दिनों में गंगा के किनारे (हरिद्वार) पहुँचे जहाँ उनकी मैत्रेय से भेंट हुई। 

वार्तालाप के दौरान विदुर ने कई विषयों पर चर्चा की। उन्होंने जब जगत की उत्पत्ति के बारे में जिज्ञासा की तो मैत्रेय ने कहा - सृष्टि के पहले संपूर्ण जगत जल में डूबा हुआ था और उसमें समस्त जीवों को उनके सूक्ष्म रूप में अपने भीतर समेटे अजन्मा, सर्वशक्तिमान, आत्मानंद नारायण लीन थे। 

कई युग बीत जाने पर जब सृष्टि का समय आया तो भगवान की नाभि से एक कमल विकसित हुआ जिसमें से ब्रह्मा प्रकट हुए। बिना किसी भौतिक पिता के उत्पन्न होने के कारण ब्रह्मा का एक नाम स्वयंभू (स्वयं जन्म लेने वाला) भी है।

कमल में स्थित ब्रह्मा को जब कोई लोक नहीं दिखाई दिया तो उन्होंने अपने चारों तरफ सिर घुमाया। इससे उनके चार सिर हो गए। वे बार-बार सोचने लगे  - मैं कौन हूँ? इस कमल का उद्गम कहाँ है? फिर वे समाधि में लीन हो गए। अपनी समाधि में उन्होंने सर्वशक्तिमान भगवान के दर्शन किए। उनकी प्रेरणा से उन्होंने सृष्टि का काम आरंभ किया।

नए युग की सृष्टि का काम आसान नहीं था। जब ब्रह्मा ने सृष्टि करनी चाही तो सबसे पहले अविद्या, मोह, राग, द्वेष आदि नकारात्मक प्रवृत्तियाँ आईं। ब्रह्मा ऐसी सृष्टि नहीं रचना चाहते थे जिसमें हर तरफ नकारात्मकता हो। 

उन्होंने पुनः भगवान का ध्यान किया और पवित्र होकर दूसरी बार सृष्टि करने का प्रयास किया। इस बार उन्होंने सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार  - इन चार मुनियों की सृष्टि की और उन्हें आदेश दिया  - पुत्रों! जाओ, अब तुम लोग संतान उत्पन्न कर इस सृष्टि का विस्तार करो। किन्तु, इन मुनियों की प्रवृत्ति ज्ञान और भक्ति की ओर थी। जगत के विषयों में उनकी थोड़ी भी रुचि नहीं थी। उन्होंने ब्रह्मा के आदेश का पालन नहीं किया।

ब्रह्मा को अपने पुत्रों से यह अपेक्षा नहीं थी। उन्हें अपने पुत्रों की अवज्ञा से बहुत क्रोध आया जिसे उन्होंने दबाना चाहा। किन्तु, उनका दबा क्रोध एक बालक के रूप में उनकी दोनों भौंहों के बीच से बाहर निकल आया। उस बालक का रंग नीला-लाल था। उसने जोर-जोर से रोते हुए ब्रह्मा से पूछा- हे विधाता! मुझे बताओ, मैं कौन हूँ? और, मेरे रहने का स्थान कहाँ है?

ब्रह्मा ने कहा - तुम जन्म लेते ही रोए, इसलिए तुम्हारा नाम 'रुद्र ' होगा। तुम्हें ग्यारह अन्य नामों से भी जाना जाएगा - मन्यु, मनु, महिनस, महान, शिव, ऋतध्वज, उग्ररेता, भव, काल, वामदेव, धृतव्रत। तुम्हारे रहने के ग्यारह स्थान होंगे- हृदय, आकाश, इंद्रियाँ, प्राण, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, सूर्य, चंद्र, तप। तुम्हारी ग्यारह रुद्राणियाँ होंगी। तुम प्रजापति हो, और, तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम सृष्टि का विस्तार करो।

रुद्र आज्ञाकारी था। उसने ब्रह्मा की आज्ञा मान ली। किंतु, उसकी संतानें भी उसी के समान रौद्र स्वभाव की निकलीं। उनके बल, स्वभाव और भीषण कर्म को देख कर ब्रह्मा चिंतित हो गए। उन्होंने सोचा कि संसार में यदि केवल ऐसे प्राणी हों जिनमें क्रोध और विध्वंसक प्रवृत्तियाँ प्रधान हों तो संसार का कल्याण नहीं हो सकता।  

ब्रह्मा ने तब रुद्र को बुलाकर कहा- हे सुरश्रेष्ठ! तुम्हारी संतानें बहुत विध्वंसक हैं। उनके कर्मों को देखकर भय और दुख उत्पन्न होता है। अब ऐसी सृष्टि और न रचो। तुम तप करो और उससे शुद्ध होकर संसार के कल्याण के लिए पुनः सृष्टि करना। रुद्र ने उनकी बात मान ली और तपस्या करने के लिए वन में चला गया। 

ब्रह्मा ने तब दस और पुत्रों को उत्पन्न किया - मरीचि, अत्रि, अङिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ, दक्ष, और नारद। किन्तु, इन पुत्रों से भी संसार की अपेक्षित    जनसंख्या नहीं बढ़ी।

ब्रह्मा जब चिंतित होकर इस विषय पर विचार कर रहे थे, तभी उनके शरीर के एक भाग से एक पुरुष निकला जिसका नाम स्वायंभुव मनु  हुआ और उनके दूसरे भाग से एक स्त्री निकली जिसका नाम शतरूपा हुआ। कालांतर में उन दोनों की संतानों से सारा जगत भर गया।  

(मूल ग्रंथ पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 



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