बीस: हिरण्याक्ष का जन्म

मैत्रेय ने कहा - दिति के दो पुत्र हुए - हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु। उनके जन्म की कथा इस प्रकार है -

एक बार ब्रह्मा के मानस-पुत्र सनकादि मुनि भगवान के दर्शन की अभिलाषा से वैकुण्ठ लोक पहुँचे। वे मुनि आयु और ज्ञान में यद्यपि बहुत बड़े थे, किन्तु वे सदा पाँच वर्ष के बच्चों की तरह दिखाई पड़ते थे। दिशाएँ ही उनका वस्त्र थीं। वे दिगंबर थे। 

वैकुण्ठ के छह द्वारों को पार कर जब वे सातवें द्वार पर पहुँच तो वहाँ उन्हें जय और विजय नामक दो द्वारपाल मिले। उन्होंने मुनियों का वास्तविक स्वरूप नहीं पहचाना और उन्हें साधारण बालक समझकर अपने डंडों से द्वार पर ही रोक दिया। मुनियों का अद्भुत तेज देखकर भी  उनके मन में श्रद्धा का भाव नहीं आया।

मुनियों को उन द्वारपालों के इस विचित्र एवं उद्दंड व्यवहार से बड़ा आश्चर्य और क्रोध हुआ। उन्होंने कहा - भगवान और उनके भक्तों के बीच क्या बाधा हो सकती है? वैकुण्ठ में तो प्रत्येक निवासी भगवान विष्णु की तरह ही गुणों वाला होता है। फिर तुम दोनों हमें इस तरह रोकने वाले कौन हो? तुममें अभी भी एक वैकुण्ठ-निवासी होने के गुण नहीं हैं। इसलिए तुम लोगों के कल्याण के लिए यही उचित है कि तुम दोनों वैकुण्ठ लोक से निकल कर उस योनि में चले जाओ जहाँ प्राणियों के तीन शत्रु  - काम, क्रोध, लोभ  - निवास करते हैं। 

मुनियों के उन कठोर वचनों को सुनकर द्वारपाल उनके चरणों में गिर पड़े और कहा  - भगवन् ! हमारे अपराध के लिए दिया गया आपका दंड हमें स्वीकार है। आपसे हमारी केवल यही प्रार्थना है कि हम चाहे किसी भी योनि में रहें, हम भगवान को कभी न भूलें।

उधर जब भगवान को अपने सेवकों के बारे में यह समाचार मिला तो वे लक्ष्मी सहित वहाँ पहुँच गए। सनकादि मुनिगण अपने आराध्य को साक्षात देख कर भक्तिविह्वल होकर उनकी स्तुति करने लगे। 

भगवान ने कहा  - मुनिगण! मैं अपने सेवकों द्वारा किए गए दुर्व्यवहार के लिए आपसे क्षमा माँगता हूँ। सेवकों के अपराध करने पर संसार उनके स्वामी को ही उत्तरदायी समझता है। आप मेरे इन सेवकों पर बस इतनी कृपा करें कि इनका निर्वासन काल शीघ्र समाप्त हो जाए और ये अपने अपराध का फल भोग कर मेरे पास लौट जाएँ।

भगवान के ऐसे विनम्र वचन सुनकर मुनिगण श्रद्धा से अभिभूत हो गए।  उनके मन में अपने क्रोध के लिए घोर पश्चाताप हुआ। उन्होंने हाथ जोड़कर भगवान से विनती की  - हे समस्त लोकों के सर्वशक्तिमान स्वामी! अपने सेवकों के प्रति आपकी यह उदारता अद्भुत है। हमने क्रोधवश आपके निरपराध सेवकों को शाप दे दिया है। उसके लिए आप हमें जो भी दंड दें, हमें स्वीकार है। 

भगवान बोले  - मुनिगण! आप दुखी न हों। आप लोगों ने मेरी प्रेरणा से ही इन्हें शाप दिया है। ये अब दैत्य योनि में जन्म लेंगे। किंतु, वहाँ भी मेरे प्रति घोर शत्रुता के भाव से ये मुझसे निरंतर जुड़े रहेंगे। मेरे निरंतर स्मरण के प्रभाव से इनकी शुद्धि हो जाएगी और ये मेरे पास लौट आएँगे। 

भगवान के इस कथन से मुनियों का संताप कुछ कम हो गया। फिर उन्होंने भगवान की आज्ञा लेकर वहाँ से प्रस्थान किया।  

भगवान ने तब जय-विजय को कहा  - तुम लोगों का कल्याण हो। मुनियों के शाप को मैं निरस्त कर सकता हूँ, किन्तु मैं ऐसा नहीं करूँगा। इसके पहले तुम लोगों ने एक बार लक्ष्मीजी को इसी तरह प्रवेश करने से रोका था जब मैं योग निद्रा में लीन था।  मुनियों के इस शाप में लक्ष्मीजी का क्रोध भी सम्मिलित है।  अब तुम लोग यहाँ से जाओ। मेरा सतत ध्यान करने के कारण  - भले ही वह शत्रुता के भाव से ही क्यों न हो  - तुम्हें मुक्ति मिल जाएगी और तुम लोग मेरे पास लौट आओगे। 

भगवान के उन्हीं द्वारपालों  जय-विजय ने दिति के गर्भ से हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु के रूप में जन्म लिया।


(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पर आधारित)


श्याम चतुर्वेदी  


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