तेईस: दक्ष द्वारा शिवजी का अपमान और गणों द्वारा यज्ञ-विध्वंस (भाग-1)
मैत्रेय बोले - दक्ष प्रजापति ने मनु-शतरूपा की पुत्री प्रसूति से विवाह किया। उनकी सोलह कन्याएँ हुईं। उनमें से एक कन्या सती का विवाह शिवजी से हुआ।
विदुर ने जिज्ञासा की - दक्ष अपनी पुत्री सती से बहुत स्नेह करता था। महादेवजी भी शांत स्वभाव के और शीलवान थे। फिर दक्ष को अपने दामाद से इतना द्वेष क्यों हो गया जिसके कारण सती को अपने प्राण तक त्याग देने पड़े?
मैत्रेय ने कहा - एक बार प्रजापतियों के यज्ञ में ब्रह्मा और शिवजी सहित समस्त देवता, ऋषिगण आदि उपस्थित हुए। उस अवसर पर जब दक्ष प्रजापति का यज्ञ-सभा में प्रवेश हुआ तो उसके तेज और वैभव से अभिभूत होकर सारे लोग अपने आसन से उठ खड़े हुए। केवल ब्रह्मा और शिवजी ही बैठे रहे।
शिवजी का यह आचरण दक्ष को बहुत बुरा लगा। उसने सोचा, ब्रह्मा के बैठे रहने की बात समझ में आती है, क्योंकि वे मेरे पिता हैं; किन्तु, शिव तो मेरा दामाद है!
सबसे मिलकर जब वह अपने आसन पर बैठा तो उसने कहा - यहाँ सभा में उपस्थित समस्त देवता एवं ऋषिगण मेरी बात सुनें। यह महादेव मेरा दामाद होने के नाते मेरे पुत्र के समान है। अतः शिष्टाचार की दृष्टि से इसे मेरा सम्मान करना चाहिये था। किंतु, इसने तो अपनी वाणी तक से मेरा सत्कार नहीं किया।
अपने क्रोध में दक्ष को यह विवेक नहीं रहा कि वह क्या बोल रहा है। उसने कहा - मुझे दुख है कि मैंने ब्रह्मा जी के कहने पर अपनी प्यारी कन्या इसे सौंप दी। यह किसी भी तरह मेरी कन्या के योग्य नहीं है। इसका केवल नाम 'शिव' (शुभ, मंगलकारी) है; इसका आचरण सर्वथा विपरीत है। यह अपने शरीर में चिता की भस्म लगाए, नरमुण्डोॅ की माला पहनकर पागलों की तरह इधर-उधर विचरण करता रहता है, अकारण कभी हँसता है, कभी रोता है। जैसा यह मतवाला है, इसके तमोगुणी अनुयायी भूत-प्रेत भी वैसे ही मतवाले हैं।
दक्ष के अभिमान को बहुत चोट पहुँची थी। वह घायल साँप की तरह अपने भीतर का विष वमन कर रहा था। किन्तु, भगवान शिव ने दक्ष के कठोर वचनों पर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई।
शिवजी की इस उदासीनता ने दक्ष की क्रोधाग्नि में घी का काम किया। क्रोध के आवेश में बिना आगे-पीछे विचारे उसने तब यह निर्णय सुनाया - आज के बाद किसी भी यज्ञ में महादेव को कोई भाग नहीं मिले!
दक्ष के इस अविवेकपूर्ण व्यवहार पर भगवान शिव के प्रमुख पार्षद नंदी को बहुत क्रोध आया। उन्होंने उसे संबोधित करते हुए कहा- तुम्हारी दृष्टि पशुओं की तरह है जो कभी शरीर के परे नहीं जा सकती। इसलिए शीघ्र ही तुम्हारा सिर बकरे का हो जाए! इस बात पर चिढ़ कर दक्ष के समर्थकों ने शिवजी के अनुयायियों को बुरा-भला कहना शुरू किया। दोनों पक्षों के पारस्परिक कलह से खिन्न होकर शिवजी अपने अनुयायियों को लेकर वहाँ से उठ कर चल दिए।
बाकी बचे लोगों ने यज्ञ संपन्न किया।
कालांतर में जब ब्रह्मा ने दक्ष को सारे प्रजापतियों का अधिपति बना दिया तो उसका गर्व और बढ़ गया। उसने एक बार वृहस्पतिसव यज्ञ का आयोजन किया जिसमें उसने भगवान शिव के सिवा शेष सबको आमंत्रित किया।
आकाश-मार्ग से अपने दिव्य विमानों से जाते देवताओं की आपसी बातचीत सुन कर सती को पता चला कि उनके पिता ने कोई यज्ञ आयोजित किया है। उन्होंने जब अपने पतियों के साथ सज-संवर कर उत्साह से चहकती जाती गंधर्वों और यक्षों की पत्नियों को देखा तो उनका मन भी यज्ञ में सम्मिलित होने और अपनी माँ एवं बहनों और दूसरे आत्मीय जनों से मिलने के लिए व्याकुल हो गया। वे बार-बार भगवान शिव को यज्ञ में चलने के लिए मनाने लगीं। उन्होंने यह भी कहा - पति, गुरु और माता-पिता के यहाँ जाने के लिए किसी आमंत्रण की आवश्कता नहीं होती।
शिवजी को दक्ष के कठोर वचन याद थे। उन्होंने सती को समझाते हुए कहा - आपका कहना ठीक है कि बंधुओं के यहाँ बिना बुलाए भी जाया जा सकता है। किंतु, जिन बंधुओं में देहाभिमान, मद, क्रोध, द्वेष हो, उनके पास हमें नहीं जाना चाहिए। विद्या, तप, धन, सुदृढ़ शरीर, युवावस्था और उच्च कुल - ये छह बातें सत्पुरुषों में गुणों की वृद्धि करती हैं, किंतु, नीच पुरुषों में उनके अवगुणों की ही वृद्धि करती हैं।
हे सती! आप सोचती होंगी कि मैंने पिछले यज्ञ में सबकी तरह उठ कर दक्ष का अभिवादन क्यों नहीं किया था। इसका सीधा कारण है कि सामान्य लोगों की तरह तत्त्वदर्शी कभी भी देहाभिमानी पुरुष के प्रति सम्मान नहीं दिखाते हैं। उनका ढंग अलग है। वे सबके भीतर स्थित वासुदेव को ही नमस्कार करते हैं। दक्ष इस बात को नहीं समझ सका।
हे सती! आप भले ही दक्ष की प्रिय पुत्री हैं, किन्तु हमारी पत्नी भी हैं। इस नाते आपको वहाँ समुचित आदर मिलने की संभावना नहीं है। आप ध्यान रखें, स्वाभिमानी व्यक्ति को जब अपने आत्मीय जनों द्वारा अपमान मिलता है तो वह तत्काल मृत्यु का कारण भी बन सकता है।
इधर पति के वचन और उधर अपने आत्मीय जनों से मिलने की उत्कंठा के बीच सती बहुत देर तक झूलती रहीं। फिर अंत में, वे अपनी भावनाओं के वश में आकर अकेली ही तेजी से अपने माता-पिता के घर चल पड़ीं। उन्हें इस तरह जाते देख कर भगवान शिव के हजारों सेवक भी उनके साथ हो लिए।
दक्ष की यज्ञशाला में पहुँचने पर सती ने देखा कि वहाँ शिवजी के लिए कोई भाग नहीं रखा है। कहीं दक्ष अप्रसन्न न हो जाए, इस आशंका से वहाँ किसी ने उनका सत्कार नहीं किया। हाँ, उनकी माँ और बहनें उनसे बहुत प्रेम और उत्साह से मिलीं। किन्तु अपने पति के अपमान के कारण क्रुद्ध सती का ध्यान उधर नहीं था।
दक्ष द्वारा भगवान शिव का अनादर किए जाने पर उनके सेवकों को भी बहुत क्रोध आया। वे जब दक्ष को दंड देने के लिए उसकी ओर बढ़ने लगे तो सती ने उन्हें रोक दिया।
फिर दक्ष को संबोधित करते हुए सती ने कहा - पिताजी! जिन शिव के नाम के उच्चारण मात्र से मनुष्य के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं, जिनका न कोई प्रिय है न ही अप्रिय, जो सभी देहधारियों की आत्मा हैं, और जिनके चरणों की धूल ब्रह्मा आदि देवता अपने सिर पर धारण करते हैं, आप ऐसे भगवान शिव से द्वेष करते हैं?
अपने शुभचिंतक पति की सलाह न मानने का पश्चाताप और पिता द्वारा पति के अपमान से उपजे क्रोध से सती थर-थर काँपने लगीं। उन्होंने कहा - मुझे आपकी पुत्री होने पर धिक्कार है! मैं अब अपने पति के पास नहीं लौटना चाहती हूँ। क्योंकि, जिस समय वे मुझे दाक्षायणी (दक्ष की पुत्री) कह कर संबोधित करेंगे, मुझे आपकी पुत्री होने का स्मरण हो जाएगा। वह क्षण देखने के पहले ही मैं आपसे उत्पन्न हुए अपने इस शव-तुल्य शरीर को अभी इसी क्षण त्याग देती हूँ।
यह कहकर सती उत्तर दिशा की ओर मुँह कर भूमि पर बैठ गईं। उन्होंने जल से आचमन कर पीला वस्त्र ओढ़ लिया। योग-क्रिया के द्वारा अपने अंगों में अग्नि और वायु की धारणा कर उन्होंने भगवान शिव के चरणों में अपना ध्यान लगा दिया। कुछ ही क्षणों में सबके देखते- ही-देखते उनका शरीर योगाग्नि में भस्मीभूत हो गया।
(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)
(अगले अंक में - भगवान शिव के गणों द्वारा दक्ष के यज्ञ का विध्वंस - भाग 2)
श्याम चतुर्वेदी
"आपकी बातें मुझे शांति और सकारात्मकता देती हैं। आप हमेशा ऐसे ही ज्ञान बांटते रहें, धन्यवाद।"🙏🙏
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