बाईस: कर्दम-देवहूति की कथा

विदुर के अनुरोध पर मैत्रेय ने स्वायंभुव मनु के वंश का  यह वर्णन किया - 

मनु-शतरूपा के दो पुत्र हुए - प्रियव्रत और उत्तानपाद। उनकी तीन कन्याएँ भी हुईं - आकूति, देवहूति और प्रसूति। मैं पहले देवहूति-कर्दम के बारे में बताता हूँ जिनके माध्यम से भगवान ने अपने अंश-रूप कपिल के रूप में जन्म लिया। 

कर्दम प्रजापति थे। उन्हें ब्रह्मा ने आज्ञा दी कि वे सृष्टि के हित में संतान उत्पन्न करें। यह एक कठिन दायित्व था। कर्दम ने स्वयं को तैयार करने के लिए सरस्वती नदी के तट पर कठोर तपस्या आरंभ की। दस हजार वर्ष बीत गए। तब उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें दर्शन दिए और कहा - महामुने! दो दिनों के बाद आपका विवाह मनु-शतरूपा की योग्य पुत्री देवहूति के साथ होगा। आप लोगों की नौ कन्याएँ होंगी। मैं भी कपिल के रूप में आप लोगों का पुत्र बन कर अंशावतार लूँगा और सांख्य-शास्त्र का निरूपण करूँगा।

दो दिनों के बाद मनु-शतरूपा अपनी पुत्री देवहूति के साथ वहाँ पधारे और कर्दम से अपनी पुत्री के पाणिग्रहण का अनुरोध किया। कर्दम ने कहा - मुझे आपका प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार है, किंतु मेरी एक शर्त है। जब तक हमारी सारी संतानें नहीं हो जातीं, तब तक मैं गृहस्थ-धर्म का पालन करते हुए इसके साथ रहूँगा। इसके बाद मैं संन्यास ले कर घर से चला जाऊँगा।

मनु-शतरूपा ने कर्दम की शर्त स्वीकार कर ली। फिर देवहूति का उनसे विवाह कर दोनों अपनी राजधानी लौट गए। 

कर्दम और देवहूति  में एक-दूसरे के प्रति बहुत प्रेम और सम्मान था। कर्दम ने अपनी पत्नी की प्रसन्नता के लिए एक दिव्य विमान रचा जो इच्छानुसार कहीं भी ले जाया सकता था। इस विमान में सुख-सुविधा की सारी सामग्रियाँ थीं। इसमें बैठ कर दंपति ने संपूर्ण भूमंडल में भ्रमण किया और फिर आश्रम लौट गए।  

समय आने पर कर्दम-देवहूति की नौ कन्याएँ और एक पुत्र हुआ। 

विवाह योग्य होने पर इन कन्याओं का इस तरह विवाह हुआ - कला, अनुसूया, श्रद्धा, हविर्भू, गति, क्रिया, ख्याति, अरुन्धती, शांति का क्रमशः मरीचि, अत्रि, अङिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ और अथर्वा के साथ।

इसके बाद कर्दम ने भगवान के अंशावतार अपने पुत्र कपिल से यह निवेदन किया - प्रभो! आपकी कृपा से मैंने अपना गृहस्थ-धर्म पूरा कर लिया है। आप मुझे अनुमति दें कि मैं अब संन्यास-मार्ग ग्रहण करूँ। मेरे हृदय में आप के सिवा और कुछ न रहे! 

भगवान कपिल ने कहा  - मुने! आप अपनी इच्छानुसार जाएँ। आप अपने संपूर्ण कर्म मुझे अर्पित करते हुए अंत में मोक्ष प्राप्त करें। समय आने पर माता को भी मैं आत्मज्ञान कराने वाला उपदेश दूँगा जिससे वे समस्त सांसारिक कष्टों से मुक्त हो जाएँगी। 

भगवान कपिल के इस प्रकार कहने पर कर्दम ने उनकी परिक्रमा की और वन के लिए प्रस्थान किया।  

कपिल अपनी माता के साथ आश्रम में ही रहने लगे।  एक दिन देवहूति ने उनसे कहा - भगवान! अब मैं  सांसारिक विषयों से थक गई हूँ। आप कृपया मुझे मेरी मुक्ति का मार्ग बताएँ। 

भगवान कपिल ने कहा - माता! मन ही जीव के बंधन और मुक्ति दोनों का कारण है। सांसारिक सुखों में आसक्त होने पर यह बंधन का कारण हो जाता है; परमात्मा में लग जाए तो यही मुक्ति का साधन बन जाता है। जिसके हृदय में ज्ञान-वैराग्य और भक्ति है और जो अपने समस्त कर्म मुझे अर्पित कर देता है, वह जीव मुक्त हो जाता है। 

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 

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