पचीस: ध्रुव की कथा (भाग-1)

मनु-शतरूपा  के दो पुत्र हुए - प्रियव्रत और उत्तानपाद।  उत्तानपाद की दो पत्नियाँ थीं  - सुरुचि और सुनीति। सुरुचि से उत्तम और सुनीति से ध्रुव का जन्म हुआ। उत्तानपाद सुरुचि के प्रति अधिक अनुरक्त था। 

एक दिन राजा उत्तानपाद उत्तम को अपनी गोद में बिठाकर दुलार कर रहा था। उसी समय बालक ध्रुव वहाँ चला आया। अपनी बाल-सुलभ इच्छा से उसने भी पिता की गोद में बैठना चाहा, किन्तु राजा ने उसका स्वागत नहीं किया। वहाँ रानी सुरुचि भी थी। उसने ध्रुव को फटकारते हुए कहा - बालक! तू साफ-साफ सुन ले। राजा की गोद में तो केवल मेरा बच्चा ही बैठेगा। यह तेरा दुर्भाग्य है कि तू किसी और माता का पुत्र है। यदि तुझे राजसिंहासन चाहिए तो जा और परमपुरुष की आराधना करके उनसे यह वरदान माँग कि तू मेरा पुत्र होकर जन्म ले।  

सुरुचि की अप्रसन्नता के भय से राजा के मुख से प्रतिरोध का एक शब्द तक नहीं निकला। सौतेली माँ के कठोर वचनों और पिता की उदासीनता से ध्रुव को बहुत चोट लगी। वह रोता हुआ अपनी माता के पास आया। अपने पुत्र के मुख से सारी घटना का विवरण सुनकर सुनीति की आँखों में आँसू भर आए। उसने ध्रुव को कई तरह से ढाढस बंधाया और अंत में बोली - बेटा! तेरी सौतेली माँ ने एक बात तो ठीक ही कही है - यदि तुझे राजसिंहासन का सम्मान चाहिए तो तू भगवान की आराधना कर। उनके सिवा तेरा दुख और कोई नहीं दूर कर सकता। 

माता सुनीति के वचन सुनकर ध्रुव ने तत्काल राजधानी छोड़ दी और वन की ओर चल पड़ा। रास्ते में उसे नारदजी मिले। उन्हें ध्रुव के संकल्प को जान कर मन ही मन बहुत विस्मय हुआ - यह नन्हा बालक कितना स्वाभिमानी है! उन्होंने उसे समझाते हुए कहा - हे पुत्र! तू अभी से मान-अपमान के चक्कर में क्यों पड़ा है? मनुष्य को चाहिए कि वह सभी परिस्थितियों में अविचलित रहे। वह मनुष्य कभी दुखी नहीं होता जो अपने से अधिक गुणसंपन्न लोगों को देखकर प्रसन्न होता है, अपने समान गुण वालों से मैत्री का भाव रखता है और अपने से कम गुण वालों पर दया करता है।  तुमने अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए जो मार्ग चुना है वह योगियों के लिए भी बहुत कठिन है। तुम अभी घर लौट जाओ। बड़े होने पर जब समय आए, तुम यह साधना कर लेना।

ध्रुव ने कहा- भगवन्! आपकी सारी बातें सत्य हैं। किंतु, इस समय मेरा हृदय मेरी विमाता के कठोर वचनों से भरा हुआ है। वहाँ आपके उपदेश प्रवेश नहीं कर सकेंगे। मुझे उस पद को पाना है जो आज तक कोई भी नहीं पा सका हो। मुझे आप वही मार्ग बताएँ।

ध्रुव की दृढ़ता के सामने नारदजी झुक गए। उन्होंने कहा - बेटा, तुम यमुना के तट पर जाओ, जहाँ अतीत में भगवान की कई लीलाएं हुई हैं। वहाँ तुम निरंतर 'ओम्  नमो भगवते वासुदेवाय' मन्त्र का जाप करते हुए भगवान का ध्यान करो। तुम्हारी संकल्प-सिद्धि का यही एक मार्ग है। 

नारदजी की बात सुनकर ध्रुव तपोवन की ओर चल पड़ा। उसके जाने के बाद नारदजी उत्तानपाद के महल में आ गए। वहाँ उन्होंने राजा को बहुत दुखी देखा। राजा बार-बार पश्चाताप कर रहा था कि क्यों उसने अपनी एक रानी के अधीन होकर ध्रुव और उसकी माता के प्रति इतना बड़ा अन्याय किया। पता नहीं, इस समय भूख-प्यास से व्याकुल वह छोटा-सा बालक वन में किस अवस्था में होगा! कहीं वह भेड़ियों का शिकार न बन गया हो!

नारदजी ने राजा को आश्वासन देते हुए कहा- राजन!आप उसकी चिंता न करें। स्वयं भगवान ही उसकी रक्षा करेंगे। 

उधर तपोवन पहुँच कर ध्रुव ने अपना कठिन तप आरंभ कर दिया। कुछ समय बीतने पर उसने आहार त्याग दिया और केवल जल पर निर्भर रहने लगा। फिर उसने जल लेना भी बंद कर दिया। अंत में, उसने अपनी सारी इन्द्रियों और मन को भगवान के साथ एकाकार करके अपनी साँसें भी रोक दीं। 

ध्रुव की तपस्या की ऐसी पराकाष्ठा देखकर सारी सृष्टि स्तब्ध रह गई। देवता घबराकर भगवान की शरण में गए और उनसे विनती करने लगे - हे प्रभु! न जाने कैसी अनहोनी हो गई है। ऐसा लगता है जैसे सारी सृष्टि के प्राण रुक गए हों। आप हमारी रक्षा करें!

भगवान ने कहा - आप सभी निश्चिंत रहें। यह हमारे महान भक्त ध्रुव की घनघोर तपस्या का प्रभाव है। अब वह समय आ गया है जब मैं उसे दर्शन दूँ। यह कहकर भगवान गरुड़ पर सवार होकर तपोवन पहुँचे जहाँ भक्त ध्रुव तपस्या में लीन था।  

भगवान ने ध्रुव को दर्शन देकर कहा - राजकुमार! मैं तुम्हारे हृदय का संकल्प जानता हूँ। इसलिए, मैं तुम्हें वह पद देता हूँ जो आज तक कोई नहीं पा सका है। मैं तुम्हें वह ध्रुव लोक देता हूँ जिसके चारों तरफ समस्त तारे और ग्रह परिक्रमा करते हैं। सृष्टि चाहे रहे या नष्ट हो जाए, यह ध्रुव-लोक सदा स्थिर रहेगा। पृथ्वी लोक में भी अपने पिता के बाद तुम्हारा शासन होगा जो हजारों वर्षों तक चलेगा। अंत में, तुम मेरे उस अविनाशी लोक में आ जाओगे जहाँ से फिर इस संसार में लौटना नहीं होता!

भगवान के प्रस्थान करने के बाद ध्रुव को एक विचित्र-सी उदासी ने घेर लिया। वह बार-बार यही सोचने लगा - मैं भी कितना मूढ़ हूँ! मैंने भगवान से अपने लिए मुक्ति क्यों नहीं माँगी? मैं उच्च पद, वैभव, यश जैसी तुच्छ वस्तुओं के लोभ में उलझ कर रह गया। मेरी स्थिति उस अभागे निर्धन व्यक्ति की तरह है जो सम्राट के सामने आकर भी अपने लिए केवल चावल के कुछ टूटे दाने ही माँगता हो!

इधर जब राजा उत्तानपाद को ध्रुव के वापस लौटने की सूचना मिली तो वह बहुत उत्साह से अपनी दोनों रानियों और पुत्र उत्तम के साथ उसके स्वागत के लिए चल पड़ा।ध्रुव को देखकर सबको बहुत प्रसन्नता हुई। सौतेली माता ने भी उसे प्यार से आलिंगन किया और लंबी आयु का आशीर्वाद दिया। उसके हृदय में ध्रुव के लिए अब कोई कटुता नहीं रह गई थी। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि जिस प्रकार ढलान पर आते ही जल अनायास बहने लगता है, उसी प्रकार जिस पर भगवान  की कृपा हो गई हो, वैसे भक्त के आगे सबके मस्तक स्वयं ही झुकने लगते हैं! 

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)


श्याम चतुर्वेदी 


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