सत्ताईस: राजा वेन की कथा

राजा ध्रुव के वंश में अङ्ग नामक एक राजा हुआ।  उसने एक बार अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान किया। आश्चर्य की बात यह थी कि सारी पद्धतियों के ठीक होते हुए भी यज्ञ में दिए गए अपने भाग को ग्रहण करने के लिए देवता नहीं पधार रहे थे। ऐसा देखकर यज्ञ करा रहे ऋत्विजों ने राजा को सुझाव दिया - राजन! अपने पूर्व जन्म के एक अपराध के कारण आप इस जन्म में पुत्रहीन हैं। इसलिए, पहले आप पुत्र-प्राप्ति के लिए एक यज्ञ करें। इसमें आप भगवान विष्णु का आवाहन करें। जब भगवान विष्णु पधारेंगे तो सारे देवता भी स्वयमेव अपना भाग लेने आ जायेंगे। 

राजा ने वैसा ही किया। यज्ञ सफल रहा। समय आने पर राजा को एक पुत्र की प्राप्ति हुई। उसका नाम वेन रखा गया। 

कई बार किसी व्यक्ति के स्वभाव का उसकी आनुवांशिकता से कोई संबंध नहीं होता। ध्रुव और अङ्ग जैसे महान राजाओं के वंश में जन्मा वेन बचपन से ही बहुत क्रूर प्रकृति का था। खेल-खेल में निरपराध मनुष्यों और पशुओं का वध कर देने में उसे कोई हिचक नहीं होती थी। उसके पिता ने उसे सुधारने का बहुत प्रयास किया। किन्तु, वेन नहीं सुधरा। अंत में, निराश होकर राजा अङ्ग ने एक रात महल छोड़ दिया और वन को चला गया। राज्य के निवासियों ने राजा को बहुत ढूँढा, किन्तु वह कहीं नहीं मिला। उन्होंने अपनी समस्या मुनियों को बताई। 

भृगु आदि मुनियों ने यह देखा कि राजा के नहीं होने से सारे राज्य में अराजकता छा गई है। सर्वत्र दुष्टों का उपद्रव होने लगा है। तब सबने अन्य कोई विकल्प नहीं देखकर आपस में विचार कर वेन को ही राजसिंहासन पर बिठा दिया।  

राजसत्ता पाकर वेन की दुष्टता और बढ़ गई। वह राजधर्म भूल गया। उसने सभी मर्यादाओं को ताक पर रख दिया और जनता पर घोर अत्याचार करने लगा। 

वेन के अत्याचारों से जनता को दुखी देखकर मुनिजन पुनः एकत्र हुए। वे आपस में कहने लगे - जैसे दोनों छोरों पर जलती लकड़ी के बीच रहने वाले चींटी-जैसे जीव त्रस्त हो जाते हैं, उसी तरह राज्य की जनता भी अपराधियों और राजा वेन के अत्याचारों के बीच पिस रही है। हमने इस वेन को जनता की रक्षा के लिए नियुक्त किया था; आज यही दुष्ट वेन अपनी जनता के लिए सबसे बड़ा संकट बन गया है।  

यह सोचकर कि संभवतः वेन उनकी बात मान जाए, मुनिगण उसे समझाने के लिए उसके पास गए। उन्होंने कहा - राजन! राजा का सबसे बड़ा धर्म है - अपनी  प्रजा की रक्षा करना। जो राजा ऐसा करता है, उससे भगवान भी प्रसन्न रहते हैं। ऐसा राजा लोक और परलोक दोनों में सुख पाता है।

वेन अपने अहंकार में चूर था। उसने मुनियों का तिरस्कार करते हुए कहा - तुम लोग किस भगवान की बात कर रहे हो? विष्णु, ब्रह्मा, शिव और बाकी सारे देवता राजा के शरीर में होते हैं। मुझसे परे कोई सत्ता नहीं है। मैं सर्वदेवमय हूँ। सर्वत्र मैं ही मैं हूँ! तुम सभी केवल मेरी ही आराधना करो। 

वेन की अहंकार भरी बातों को सुनकर मुनियों के क्रोध का ठिकाना न रहा। उन्होंने एक स्वर में कहा  - मार डालो! इस अधर्मी, दुष्ट वेन को अभी मार डालो! यह यदि जीवित रह गया तो प्रजा नष्ट हो जाएगी। 

भगवान की निंदा करने के कारण वेन पहले ही मर चुका था। मुनियों ने अपने हुंकारों से उसका रहा-सहा जीवन भी समाप्त कर दिया। 

(शेष अगले अंक में)

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)


श्याम चतुर्वेदी 

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