छब्बीस: ध्रुव की कथा (भाग-2)
ध्रुव के राजधानी लौटने पर प्रजा, अमात्य-वर्ग और राजपरिवार के सभी सदस्य बहुत प्रसन्न हुए। समय आने पर राजा उत्तानपाद ने ध्रुव को राजसिंहासन सौंप दिया और तप के लिए वन को चला गया।
एक दिन ध्रुव का सौतेला भाई उत्तम जब हिमालय क्षेत्र में शिकार कर रहा था, उसे एक बलवान यक्ष ने मार डाला। ध्रुव को जब यह समाचार मिला तो उसके क्रोध का ठिकाना न रहा। वह यक्षों से प्रतिशोध लेने के लिए उनकी नगरी अलकापुरी जा पहुँचा। वहाँ यक्षों से उसका घनघोर युद्ध हुआ जिसमें बड़ी संख्या में यक्ष मारे गए।
ध्रुव के हाथों यक्षों के अविवेकपूर्ण संहार को देखकर उसके पितामह स्वायंभुव मनु को बहुत चिंता हुई। वे कई ऋषियों को साथ लेकर ध्रुव के पास पधारे और उससे कहा- हे पुत्र! अब अपने क्रोध पर लगाम दो। तुम्हारा अपने भाई के प्रति प्रेम समझ में आता है। किंतु, थोड़ा सोचो, उसे मारनेवाला एक ही यक्ष था। और, यहाँ तुमने उस एक के अपराध के लिए न जाने कितने निरपराध यक्षों को मार डाला है!
ध्रुव! तुमने तो अपने बचपन में ही परमेश्वर का साक्षात्कार कर लिया है। भगवान के ऐसे भक्त को यह क्रूरतापूर्ण आचरण शोभा नहीं देता। तुम्हारे इस कर्म से यक्षों के स्वामी कुबेर भी, जो भगवान शिव के सखा हैं, बहुत क्षुब्ध हैं। तुम उन्हें और क्रुद्ध मत करो। हमारे परिवार का कल्याण इसी में है कि तुम यह युद्ध बंद कर दो।
मनु के इस तरह समझाने पर ध्रुव ने युद्ध रोक दिया। तब वहाँ कुबेर आए और ध्रुव को संबोधित करते हुए बोले - पुत्र! मुझे प्रसन्नता है कि तुमने अपना वैर-भाव त्याग दिया। यदि ध्यान से देखा जाए तो तुम्हारे भाई अथवा अन्य यक्ष की मृत्यु काल-वश ही हुई है। अब तुम अपनी राजधानी लौट जाओ। भगवान तुम्हारा मंगल करें। हाँ, जाने के पहले तुम्हारी जो इच्छा हो, तुम मुझसे वह वर माँग लो।
ध्रुव ने कुबेर से यही वर माँगा कि उसे सदा भगवान की अखंड स्मृति बनी रहे। कुबेर वर देकर वहाँ से चले गए।
(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)
श्याम चतुर्वेदी
Ati sunder vyakhan.
जवाब देंहटाएंJai Shree Krishna.