अट्ठाइस: राजा पृथु की कथा
जब राजा वेन का अपनी प्रजा पर अत्याचार बहुत बढ़ गया तो मुनियों ने लोकहित में उसे मार डाला। फिर मुनिगण अपने-अपने आश्रम लौट गए। इधर वेन की माता ने कुछ विचार कर उसका शरीर सुरक्षित रखा।
वेन की मृत्यु के बाद राज्य में एक बार फिर अराजकता फैल गई। प्रजा को अपराधियों ने सताना शुरू कर दिया। राज्य को कभी भी राजा के बिना नहीं रहना चाहिए - यह सोच कर मुनिगण राजधानी में आ गए।
राजा वेन यद्यपि क्रूर और अधर्मी था, किन्तु वह विख्यात अंग वंश की परम्परा में था। यह विचार कर एक श्रेष्ठ उत्तराधिकारी पाने की संभावना से मुनियों ने वेन की भुजाओं का मंथन किया जिससे पृथु का जन्म हुआ। समस्त देवताओं ने उसे कई तरह की विशेष शक्तियाँ दीं।
पृथु के राज्याभिषेक के अवसर पर उसकी स्तुति करने के लिए सूत, मागध और वंदीजन सामने आए। उन्हें देख कर राजा पृथु ने हँसते हुए कहा - अभी तो मैंने कुछ किया भी नहीं है। आप भला हमारी किस बात के लिए स्तुति करेंगे? कोई भी स्वाभिमानी व्यक्ति न तो अपनी निंदा में न ही अपनी प्रशंसा में रुचि रखता है।
वंदीजनों ने कहा - हे राजन! मुनियों की प्रेरणा से हम यह विश्वास करते हैं कि आप जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरेंगे। जैसे, सूर्य धरती से वाष्प के रूप में जल लेकर पुनः उसे वृष्टि के रूप में लौटा देता है, उसी प्रकार आप जनता से कर लेकर उसका उपयोग जनता के लिए ही करेंगे। आप न्यायप्रिय होंगे। अपराध नहीं करने पर आप अपने शत्रु के पुत्र को भी दंड नहीं देंगे और अपराध करने पर अपने पुत्र को भी दंडित करेंगे। आपकी प्रजा आपसे उतना ही स्नेह करेगी जितना कोई अपने शरीर से करता है।
(शेष अगले अंक में)
(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)
श्याम चतुर्वेदी
Bahut sundar vyakhan hai.
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