तीस: पृथु के यज्ञ में इंद्र द्वारा व्यवधान
राजा पृथु ने सौ यज्ञ करने का संकल्प लिया। देवताओं के राजा इंद्र को यह जानकर बहुत चिंता हुई - सौ यज्ञ करके तो पृथु मुझसे भी आगे बढ़ जाएगा...!
इंद्र किसी भी तरह पृथु को रोकने की चेष्टा करने लगा। जब पृथु ने निन्यानबे यज्ञ सफलतापूर्वक संपन्न कर अंतिम यज्ञ आरंभ किया तो इंद्र ने उसके यज्ञ का घोड़ा चुरा लिया। उस समय उसने एक साधु का वेश बनाया हुआ था।
मुनि अत्रि के द्वारा सूचित करने पर पृथु के पुत्र ने इंद्र का पीछा किया, किंतु उसे साधु वेश में देखकर वह भी भ्रमित हो गया। अत्रि मुनि ने जब उसे वास्तविकता बताई तो उसने इंद्र के ऊपर आक्रमण किया। भयभीत इंद्र बीच में ही घोड़े को छोड़कर भाग गया।
पृथु-पुत्र घोड़े को लेकर यज्ञशाला पहुँचा। इंद्र ने फिर एक बार कपट का सहारा लिया। उसने यज्ञशाला में सर्वत्र अंधकार फैला दिया और अंधकार की ओट में घोड़े को चुराकर भाग चला। इस बार भी उसने एक साधु का वेश बनाया हुआ था। मुनि अत्रि ने फिर पृथु के पुत्र को वास्तविकता बताई। उसके द्वारा पीछा किए जाने पर इंद्र ने घोड़ा छोड़ दिया।
इन्द्र के इस नीच आचरण को देखकर पृथु को उस पर बहुत क्रोध आया। उसने अपने धनुष पर बाण चढ़ाया और उसे मारने आगे बढ़ा। यह देखकर उसके यज्ञ के पुरोहितों ने कहा - हे राजन! आप यदि यज्ञ के बीच में किसी का वध करेंगे तो यह यज्ञ असफल हो जाएगा। आप यह काम हमलोगों पर छोड़ दें। हम अपने मंत्रों की शक्ति से इंद्र को यहाँ खींचकर उसको यहीं अग्नि में हवन कर देंगे। वैसे भी, वह आपसे ईर्ष्यावश नीच कर्म करने के कारण लगभग मर ही चुका है।
इसके बाद पुरोहितों ने मंत्र द्वारा इंद्र का आवाहन किया।वे उसे यज्ञ की अग्नि में डालना ही चाहते थे कि वहाँ ब्रह्मा प्रकट हुए।
ब्रह्मा ने पृथु से कहा - हे राजन! आप सौवां यज्ञ करने का विचार छोड़ दें। इंद्र बार-बार इस यज्ञ में विघ्न डालने का प्रयास करता रहेगा। वह प्रत्येक बार धार्मिक वेश के पाखंड का सहारा लेगा। और, यह सब देखकर जनता में भी धार्मिक लोगों के प्रति भ्रम और अनादर बढ़ेगा। आप और इंद्र दोनों ही भगवान के अंश हैं। आप दोनों की सत्ता का एक विशेष उद्देश्य है। आप चाहे सौ यज्ञ न करें, तो भी आपकी महानता में कोई अन्तर नहीं पड़ता।
विधाता की यही इच्छा है, यह विचार कर पृथु ने सौवां यज्ञ नहीं किया।
[राजा पृथु उचित रास्ते पर था। इंद्र ने नीचता भरा काम किया, किंतु ब्रह्मा ने इंद्र का पक्ष लिया।
Life isn't always fair!]
(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)
श्याम चतुर्वेदी
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