इकतीस: पृथु के यज्ञ में भगवान विष्णु का प्रकट होना

पृथु ने ब्रह्मा की बात मानकर सौवां यज्ञ करने का विचार छोड़ दिया। ( देखें - पिछला अंक - "तीस: पृथु के यज्ञ में इंद्र द्वारा व्यवधान") जब इंद्र अपने अपराधों के लिए लज्जित होकर पृथु के चरणों पर गिरने लगा तो पृथु ने सब कुछ भुलाकर उसे क्षमा कर दिया। उसकी क्षमाशीलता की सबने बहुत प्रशंसा की। 

स्वयं भगवान विष्णु ने यज्ञ-स्थल पर प्रकट होकर पृथु को योग्य पात्र समझकर उस सत्य का उपदेश दिया जिसे जान लेने के बाद फिर किसी भौतिक सुख में आसक्ति नहीं रह जाती। भगवान बोले - राजन! आत्मा शरीर से भिन्न है।  यह कभी भी शरीर से संबंधित किसी सुख अथवा दुख से लिप्त नहीं होता। आत्मा के बारे में यह ज्ञान और इसके अनुसार आचरण ही परम शांति, ब्रह्म अथवा कैवल्य कहलाता है। 

पृथु! तुम राजा हो। तुम अपना राजधर्म निभाओ।  राजा का कल्याण उसकी प्रजा के कल्याण में ही है।   कल्याणकारी राजा को उसकी प्रजा के पुण्यों का छठा भाग मिलता है। इसके विपरीत, जो राजा प्रजा से केवल कर वसूलता है, किंतु उसकी रक्षा नहीं करता, उसका सारा पुण्य नष्ट हो जाता है और वह प्रजा के पाप का भागी बनता है।

राजन! तुम्हारी क्षमाशीलता और अन्य गुणों ने मुझे वश में कर लिया है। तुम मुझसे कोई वर माँगो। 

राजा पृथु ने भक्तिपूर्वक कहा - हे प्रभु! भौतिक सुखों की मुझे कोई चाह नहीं है। फिर भी, जिस प्रकार एक पिता अपनी संतान के बोले बिना भी उसका कल्याण करता है, आप भी वही करें जिसमें मेरा हित हो। 

भगवान ने प्रसन्नता से कहा - राजन! मुझमें तुम्हारी अटूट भक्ति बनी रहे। इस भक्ति के माध्यम से तुम मेरी दुस्तर माया को आसानी से पार कर लोगे। 

यह कहकर भगवान अंतर्धान हो गए। पृथु ने भी अपने नगर की ओर प्रस्थान किया। 

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 





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