उनतीस: पृथु द्वारा जनकल्याण

जब पृथु राजा बना, उस समय सर्वत्र अकाल पड़ा हुआ था। जनता अन्न के अभाव में बहुत कष्ट में थी। जनता ने राजा से विनती की  - महाराज! जैसे कोटर में सुलगती आग समूचे पेड़ को जला डालती है, उसी तरह हमारे पेट की आग हमें भी समाप्त कर रही है। आप कृपया कुछ उपाय करें जिससे हमारे प्राण बचें। 

पृथु ने इस पर बहुत देर तक विचार किया। उसने पाया कि यह सारा संकट इसलिए है क्योंकि पृथ्वी ने अब अन्न और औषधियाँ देना बंद कर दिया है। पृथु ने क्रोध में भरकर समस्त पृथ्वी को खोद डालने का निश्चय किया। 

तब पृथ्वी ने राजा से निवेदन किया  - हे राजन! बिना कारण जाने आपका मुझ पर क्रोध करना उचित नहीं है। वस्तुतः जब राजाओं ने मेरा पालन और आदर करना छोड़ दिया तो सर्वत्र दुराचारी लोगों की संख्या बढ़ गई। मेरे द्वारा दिए गए अन्न को खाकर ये दुराचारी बल में बढ़ते चले गए। मैं अपने अन्न से उन्हें और बलशाली नहीं बनाना चाहती थी। इसलिए, मैंने अन्न और औषधियों को अपने भीतर छिपा लिया। 

पृथ्वी ने फिर राजा पृथु को दो उपाय बताए -  एक, आप योग्य बछड़ा, पात्र और दुहनेवाले की व्यवस्था करें। मेरा दोहन कर सबको अपनी मनचाही वस्तु मिल जाएगी। दूसरे, आप मुझको समतल करें जिससे मेरे ऊपर वर्षा ऋतु के बाद भी जल ठहरा रहे और मेरी भीतरी आर्द्रता बनी रहे।

पृथ्वी की बात सुनकर पृथु ने मनु को बछड़ा और अपने दोनों हाथों को पात्र बनाकर सारे धान्य और औषधियों का दोहन किया। ऋषिगण ने वृहस्पति को बछड़ा बनाकर अपने इन्द्रियरूपी पात्र में समस्त ज्ञान-विज्ञान का दोहन किया। देवताओं ने इन्द्र को बछड़ा बनाकर सोने के पात्र में अमृत, ओज, बल का दोहन किया। दैत्यों ने प्रह्लाद को बछड़ा बनाकर लोहे के पात्र में मदिरा एवं अन्य नशीले पदार्थों का दोहन किया। गंधर्वों और अप्सराओं ने विश्वावसु को बछड़ा बनाकर कमल रूपी पात्र में संगीत एवं सौंदर्य का दोहन किया। इसी तरह, अपने-अपने लिए साँप, बिच्छू आदि प्राणियों ने विष, शाकाहारी पशुओं ने घास, मांसाहारी पशुओं ने कच्चा मांस, वृक्षों ने रस, पर्वतों ने विभिन्न धातुओं का दोहन किया। 

फिर पृथु ने परिश्रम कर पहाड़ों को तोड़ कर पृथ्वी को समतल बनाया। इन स्थानों पर उसने गाँव, नगर, दुर्ग बनाए और लोगों को बसाया। इसके पहले, लोगों के बसने की कोई निश्चित जगह नहीं होती थी। पृथु के प्रयास से अब जनता ज्यादा व्यवस्थित जीवन जीने लगी। 

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)


श्याम चतुर्वेदी 

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