संदेश

जनवरी, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

34 : राजा प्रियव्रत की कथा

स्वायंभुव मनु के दो पुत्र थे  -  उत्तानपाद और प्रियव्रत।प्रियव्रत सर्वगुण-संपन्न था। उसके पिता ने उसे योग्य समझकर पृथ्वी के शासन करने का आदेश दिया। किन्तु, प्रियव्रत ने अपने-आपको भगवान वासुदेव के चरणों में समर्पित कर दिया था। उसे राज्य का तनिक भी लोभ नहीं था। 'कहीं मैं राज्य मिलने पर भगवान की भक्ति छोड़ कर व्यर्थ के सांसारिक प्रपंचों में न पड़ जाऊँ', ऐसा विचारकर उसने अपने पिता की आज्ञा नहीं मानी।  यह देखकर कि संसार और प्रियव्रत के हित में यही है कि प्रियव्रत पहले अपने सांसारिक कर्तव्यों का  पालन करे, फिर वैराग्य का मार्ग चुने, ब्रह्मा अपने पार्षदों के साथ प्रियव्रत के पास पहुँचे। उन्होंने उसे समझाते  हुए  कहा - पुत्र, ईश्वर का विधान है कि मनुष्य अपने शरीर के माध्यम से पहले अपने कर्मों का फल - सुख-दुख भोगे। इसकी अवज्ञा मत करो। जो बुद्धिमान पुरुष अपनी इन्द्रियों को जीत चुका है और अपनी आत्मा में ही रमण करता है, उसका गृहस्थ-जीवन भला क्या बिगाड़ सकता है? जैसे, किले में सुरक्षित रहकर लड़ने वाला राजा अपने प्रबल शत्रुओं को जीत लेता है, उसी तरह जिसे छह शत्...

तैंतीस: राजा पुरंजन की कथा (2)

(गतांक सेआगे) (इस कहानी की पृष्ठभूमि के लिए " बत्तीस: राजा पुरंजन की कथा भाग-1" पढ़ें) नारद ने कहानी आगे बढ़ाई  - राजा पुरंजन को अपनी रानी के साथ रहते कई वर्ष बीत गए। उनकी कई संतानें हुईं। अपने परिवार के मोह में वह इतना बंध गया कि उसे पता नहीं चला कि वह कब बूढ़ा हो गया। उधर, अपने राज-काज  पर ध्यान न देने के कारण उसके राज्य की शक्ति भी कम हो गई।  जब गंधर्वराज चंडवेग ने राजा और उसके राज्य की यह अवस्था देखी तो उसने अपने 360 बलशाली गंधर्वों और उनकी उतनी ही गंधर्वियों के साथ उसके राज्य पर आक्रमण कर दिया। यह देखकर पाँच फनों वाला नगर- रक्षक साँप अपनी पूरी शक्ति से उनका सामना करने आगे बढ़ा।  उन्हीं दिनों काल (समय) की कन्या जरा (शब्दार्थ  - वृद्धावस्था/बुढ़ापा) अपने वर की खोज में तीनों लोकों में भटक रही थी। उसने पहले नारद के सामने विवाह का प्रस्ताव किया। परन्तु, नारद आजीवन ब्रह्मचारी थे। उन्होंने जरा के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। तब क्रोध में आकर जरा ने उन्हें श्राप दिया - तुमने मेरी प्रार्थना स्वीकार नहीं की। अतः तुम कभी एक स्थान पर अधिक देर ठहर नहीं सकोगे।  नारद से ...

बत्तीस: राजा पुरंजन की कथा (1)

पृथु के वंश में प्राचीनबर्हि नामक एक राजा हुआ।  उसकी कर्मकांड में बहुत रुचि थी। उसकी ऐसी अवस्था देखकर एक दिन नारद ने उससे कहा - राजन! तुम धर्म के वास्तविक स्वरूप को भूल गए हो। इन व्यर्थ के कर्मकांडों से तुम्हारा भला क्या कल्याण हो सकता है! तुमने धर्म के नाम पर यज्ञ में हजारों निरपराध पशुओं की बलि दी है। यह निर्दयता है; धर्म नहीं। मैं तुम्हें राजा पुरंजन की कथा सुनाता हूँ।  नारद ने कहा- राजा पुरंजन एक बार अपने मित्र अविज्ञात के साथ घूमते-घूमते हिमालय के दक्षिण में पहुँचा जहाँ उसने नौ द्वारों वाला एक सुंदर नगर देखा। वहाँ उसे एक अत्यंत सुंदर स्त्री मिली जो अपने दस अंगरक्षकों के साथ चल रही थी। प्रत्येक अंगरक्षक की सौ-सौ पत्नियाँ थीं। एक पाँच फनों वाला साँप उस स्त्री की हर तरफ से रक्षा कर रहा था।  उस स्त्री की सहमति से राजा ने उससे विवाह कर लिया और उसी नगर में रहने लगा। उस नगर में दो अंधे थे। राजा उनकी सलाह से ही अपने सारे काम करता था और जाता था। समय के साथ पुरंजन की अपनी पत्नी में आसक्ति इतनी बढ़ गई कि वह उसके हाथ एक पालतू बंदर की तरह आचरण करने लगा। जब वह हँसती थी तो राज...