तैंतीस: राजा पुरंजन की कथा (2)

(गतांक सेआगे)

(इस कहानी की पृष्ठभूमि के लिए "बत्तीस: राजा पुरंजन की कथा भाग-1" पढ़ें)

नारद ने कहानी आगे बढ़ाई  -

राजा पुरंजन को अपनी रानी के साथ रहते कई वर्ष बीत गए। उनकी कई संतानें हुईं। अपने परिवार के मोह में वह इतना बंध गया कि उसे पता नहीं चला कि वह कब बूढ़ा हो गया। उधर, अपने राज-काज  पर ध्यान न देने के कारण उसके राज्य की शक्ति भी कम हो गई। 

जब गंधर्वराज चंडवेग ने राजा और उसके राज्य की यह अवस्था देखी तो उसने अपने 360 बलशाली गंधर्वों और उनकी उतनी ही गंधर्वियों के साथ उसके राज्य पर आक्रमण कर दिया। यह देखकर पाँच फनों वाला नगर- रक्षक साँप अपनी पूरी शक्ति से उनका सामना करने आगे बढ़ा। 

उन्हीं दिनों काल (समय) की कन्या जरा (शब्दार्थ  - वृद्धावस्था/बुढ़ापा) अपने वर की खोज में तीनों लोकों में भटक रही थी। उसने पहले नारद के सामने विवाह का प्रस्ताव किया। परन्तु, नारद आजीवन ब्रह्मचारी थे। उन्होंने जरा के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। तब क्रोध में आकर जरा ने उन्हें श्राप दिया - तुमने मेरी प्रार्थना स्वीकार नहीं की। अतः तुम कभी एक स्थान पर अधिक देर ठहर नहीं सकोगे। 

नारद से निराश होकर जरा यवनराज भय के पास गई। भय ने उससे कहा -  तू मेरी बहन बन जा। फिर मैं तुम्हारे और अपने भाई प्रज्वार के साथ मिलकर अपनी विशाल सेना लेकर सारे लोकों में विचरुँगा। हमारी शक्ति को कोई न रोक पाएगा। जरा ने भय का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। फिर इन तीनों ने मिलकर राजा पुरंजन के नगर पर भयानक आक्रमण कर दिया। 

पुरंजन का नगर गंधर्वों और यवनराज के आक्रमण को झेल नहीं पाया। कई वर्षों तक उनसे युद्ध करने के कारण नगर-रक्षक साँप की शक्ति भी क्षीण हो गई थी।  "अब मैं इस नगर की और रक्षा नहीं कर सकता!", यह सोच कर वह साँप दुख से रोने लगा। 

यवनराज भय ने राजा पुरंजन को बंदी बना लिया और उसे पशु की तरह बांध कर अपने साथ ले चला।  नगर-रक्षक साँप भी उसी के साथ हो लिया। देखते-ही-देखते पुरंजन का नगर नष्ट हो गया। 

अपनी मृत्यु आने तक राजा अपने बिना अपनी प्यारी स्त्री की दुर्दशा का विचार करता रहा। अगले जन्म में  उसने विदर्भराज की कन्या बनकर जन्म लिया। इस जन्म में उसका विवाह मलयध्वज नामक एक प्रतापी राजा से हुआ। मलयध्वज ने वर्षों तक शासन करने के बाद महल छोड़ दिया और तपस्या करते हुए अपने प्राण त्याग दिए।

अपने पति की मृत्यु से संतप्त होकर विदर्भराज की कन्या भी अपने प्राण त्यागने के लिए उद्यत हुई। तभी वहाँ एक ब्रह्मज्ञानी आया। उसने कहा - "क्या तुम्हें राजा पुरंजन वाला अपना पूर्व जन्म स्मरण नहीं है? मुझे देखो, मैं तुम्हारा वही अविज्ञात नामक मित्र हूँ, जिसे तुमने नगर के द्वार पर ही छोड़ दिया था।

"पहले मैं और तुम एक दूसरे के परम सखा थे। हम दो हंसों की तरह साथ-साथ सर्वत्र मुक्त विचरण करते थे। किंतु, विषय भोगों की लालसा में तुमने मेरा साथ छोड़ दिया और उस नगर में प्रवेश कर गए। फिर वहाँ की माया से ग्रस्त होकर तुम अपना वास्तविक स्वरूप भी भूल गए। 

"तुम इसको ठीक से समझो  - तुम न तो स्त्री हो न ही पुरुष। जो मैं हूँ (ईश्वर), वही तुम भी हो (जीव)। तुम्हारा वास्तविक स्वरूप यही है। अविद्या के कारण ही हमें स्त्री और पुरुष का, ईश्वर और जीव का भेद दिखाई पड़ता है।" 

इस प्रकार पुरंजन को आत्मज्ञान मिला। 

नारद की बातें सुनकर राजा प्राचीनबर्हि ने कहा- "भगवन्! इस कहानी का अर्थ  कृपया विस्तार से समझाएं।" 

नारद ने कहा - "राजन, राजा पुरंजन जीव का प्रतीक है। उसका सखा अविज्ञात ईश्वर है जो नाम-गुण से परे है। मानव देह वह नगर है जिसमें प्रवेश कर जीव सुख-दुःख भोगता है। इस नगर (देह) में नौ द्वार हैं - दो आँखें, दो नासिका-छिद्र, दो कान, मुख, लिंग, गुदा। पुरंजन की स्त्री बुद्धि का प्रतीक है। जीव अपनी बुद्धि के वश में होकर उसी की इच्छा-अनुसार सारे कर्म करता है।

"दस इन्द्रियाँ (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ) उसके अंगरक्षक हैं। इन्द्रियों की वृत्तियाँ उनकी पत्नियाँ हैं। प्राण, अपान, व्यान, उदान, समानरूप पाँच वृत्तियों वाला प्राण ही नगर का रक्षक  साँप है।

"हाथ और पांव वे दो अंधे पुरुष हैं।  हाथों की सहायता से जीव अपने सारे काम करता है और अपने पैरों से कहीं भी आता-जाता है। 

"शरीर रथ है। पाँच इन्द्रियाँ उसके पाँच घोड़े हैं। पुण्य और पाप उसके दो पहिये हैं। इन्द्रियों के विषय उनके आयुध (हथियार) हैं। निर्दोष पशुओं का अंधाधुंध शिकार इन्द्रियों का अनियंत्रित व्यवहार है।  

"गंधर्वराज चंडवेग वास्तव में काल (समय) का प्रतीक है। 360 गन्धर्व* और 360 स्त्रियाँ* क्रमशः दिन और रात्रि हैं। (टिप्पणी अंत में देखें।)

"यवनराज मृत्यु का प्रतीक है। जरा वृद्धावस्था है जिसे कोई भी पसंद नहीं करता। प्रज्वार शीत और उष्म के दुख का प्रतीक है। जरा और  प्रज्वार दोनों मिलकर जीव को मृत्यु की ओर धकेलते हैं।

"जब तक मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचान लेता, तब तक वह कर्म-बंधनों में बंधा रहता है।  उसको दुख से कभी भी छुटकारा नहीं मिलता। यदि कभी ऐसा प्रतीत हो कि उसे किसी दुख से तात्कालिक  छुटकारा मिला, तो वह भी ऐसा ही है जैसे सिर पर का भारी बोझ हटा कर कंधे पर रख दिया गया हो।"

नारद की बातें सुनकर राजा प्राचीनबर्हि ने कर्मकांड छोड़ कर भगवान की भक्ति में अपना जीवन समर्पित कर दिया। 

*टिप्पणी: कुछ लोगों को यह जिज्ञासा हो सकती है कि 360 क्यों, 365 क्यों नहीं? तो इसका उत्तर ChatGPT ने यह दिया -

भारतीय (पारंपरिक) कैलेंडर में 360 दिनों के वर्ष की अवधारणा प्रतीकात्मक, खगोलीय और गणितीय है; यह वास्तविक सौर वर्ष (लगभग 365¼ दिन) का खंडन नहीं करती। आइए इसे चरणबद्ध रूप में स्पष्ट करें।

1. सबसे पहले, एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण

भारत कभी भी 365¼ दिनों के सौर वर्ष से अनभिज्ञ नहीं रहा है।

प्राचीन भारतीय खगोलविद भली-भाँति जानते थे कि—

सौर वर्ष ≈ 365.2422 दिन

चंद्र वर्ष ≈ 354 दिन

वेदाङ्ग ज्योतिष, सूर्य सिद्धांत तथा बाद के अन्य सिद्धान्तिक ग्रंथ इन मानों और अधिक मास (intercalation) की व्यवस्था पर स्पष्ट रूप से चर्चा करते हैं।

तो फिर 360 कहाँ से आया?

2. 360 एक वैचारिक (आदर्श) वर्ष है, न कि नागरिक (कैलेंडरी) वर्ष

(क) 360 आदर्श सौर वृत्त है

एक वृत्त = 360 अंश (डिग्री)

सूर्य एक वर्ष में एक पूर्ण वृत्त की परिक्रमा करता है

अतः—

1 दिन ≈ सौर गति का 1 अंश (आदर्शीकृत)

इससे—

12 महीने × 30 दिन = 360 दिन

प्रत्येक महीना = सौर गति के 30 अंश

यह खगोलीय अमूर्तन (abstraction) है, न कि कैलेंडर की जिद।

3. गणितीय दृष्टि से 360 को प्राथमिकता क्यों

(क) 360 एक अत्यधिक संयोज्य संख्या (highly composite number) है।

यह साफ़-साफ़ विभाजित हो जाती है:

2, 3, 4, 5, 6, 8, 9, 10, 12 आदि से।

इससे आधुनिक गणित के विकास से पहले—

तिथियों,

नक्षत्रों,

योगों,

ग्रहों की गति

की गणनाएँ कहीं अधिक सरल हो जाती थीं।

4. वैदिक समय-इकाइयों में 360

कई वैदिक समय-प्रतिमान नागरिक नहीं, बल्कि अनुष्ठानिक–ब्रह्माण्डीय थे:

360 दिन → प्रतीकात्मक वर्ष

360 अस्थियाँ (वेदों में अनुष्ठानिक प्रतीकवाद)

अग्निचयन में वेदी-निर्माण की 360 ईंटें

वर्ष को एक ब्रह्माण्डीय शरीर की तरह देखा गया, न कि केवल कैलेंडर के पन्ने की तरह।

5. वास्तविक कैलेंडरों ने अंतर की भरपाई की

क्योंकि 360 ≠ 365, इसलिए भारतीय प्रणालियों ने इस अंतर को कभी नज़रअंदाज़ नहीं किया।

उपयोग में लाई गई सुधार विधियाँ—

अधिक मास

निश्चित तिथियों के बजाय तिथियों के माध्यम से समायोजन

अलग-अलग गणना—

सौरमान (सौर वर्ष)

चान्द्रमान (चंद्र वर्ष)

अतः—

360 ढाँचा था; समायोजन वास्तविकता।

6. अन्य सभ्यताओं से तुलना

भारत अकेला नहीं था।

बेबीलोनियन → 360-दिवसीय आदर्श वर्ष

प्राचीन मिस्र → 360 + 5 अतिरिक्त (epagomenal) दिन

मायन सभ्यता → 360-दिवसीय टुन (अनुष्ठानिक वर्ष)

क्यों?

क्योंकि खगोलशास्त्र की शुरुआत कैलेंडरों से नहीं, ज्यामिति से हुई थी।

7. एक वाक्य में

भारतीय परंपरा में 360-दिवसीय वर्ष सूर्य की गति का एक गणितीय–ब्रह्माण्डीय मॉडल है, न कि वर्ष की वास्तविक अवधि के बारे में कोई दावा।

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण, चतुर्थ स्कंध: अध्याय 25-29 पर आधारित)


श्याम चतुर्वेदी 



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