बत्तीस: राजा पुरंजन की कथा (1)
पृथु के वंश में प्राचीनबर्हि नामक एक राजा हुआ। उसकी कर्मकांड में बहुत रुचि थी। उसकी ऐसी अवस्था देखकर एक दिन नारद ने उससे कहा - राजन! तुम धर्म के वास्तविक स्वरूप को भूल गए हो। इन व्यर्थ के कर्मकांडों से तुम्हारा भला क्या कल्याण हो सकता है! तुमने धर्म के नाम पर यज्ञ में हजारों निरपराध पशुओं की बलि दी है। यह निर्दयता है; धर्म नहीं। मैं तुम्हें राजा पुरंजन की कथा सुनाता हूँ।
नारद ने कहा- राजा पुरंजन एक बार अपने मित्र अविज्ञात के साथ घूमते-घूमते हिमालय के दक्षिण में पहुँचा जहाँ उसने नौ द्वारों वाला एक सुंदर नगर देखा। वहाँ उसे एक अत्यंत सुंदर स्त्री मिली जो अपने दस अंगरक्षकों के साथ चल रही थी। प्रत्येक अंगरक्षक की सौ-सौ पत्नियाँ थीं। एक पाँच फनों वाला साँप उस स्त्री की हर तरफ से रक्षा कर रहा था।
उस स्त्री की सहमति से राजा ने उससे विवाह कर लिया और उसी नगर में रहने लगा। उस नगर में दो अंधे थे। राजा उनकी सलाह से ही अपने सारे काम करता था और जाता था।
समय के साथ पुरंजन की अपनी पत्नी में आसक्ति इतनी बढ़ गई कि वह उसके हाथ एक पालतू बंदर की तरह आचरण करने लगा। जब वह हँसती थी तो राजा भी हँसता था, जब वह उदास होती तो राजा भी उदास हो जाता, जब वह चलती तो राजा भी चलता, जब वह बैठती तो राजा भी बैठ जाता...
एक दिन राजा की शिकार करने की बहुत इच्छा हुई। रानी को बिना बताए वह पाँच घोड़ों के रथ पर सवार होकर वन की ओर निकल पड़ा। उसने दिनभर में हजारों निर्दोष पशुओं को मार डाला।
जब वह थका-हारा अपने महल पहुँचा तो रानी ने उससे मुँह फेर लिया। राजा ने बार-बार उससे अपने अपराध के लिए क्षमा माँगी। उसके मनाने पर रानी मान तो गई किंतु इसके बाद राजा पर उसका नियंत्रण और बढ़ गया।
( यह एक प्रतीकात्मक कहानी है जिसका अर्थ अगले अंक में खुलेगा।)
(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)
श्याम चतुर्वेदी
हम प्रतीक्षा करेंगे अगले अंक की
जवाब देंहटाएंBahut sundar vyakhan
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