34 : राजा प्रियव्रत की कथा
स्वायंभुव मनु के दो पुत्र थे - उत्तानपाद और प्रियव्रत।प्रियव्रत सर्वगुण-संपन्न था। उसके पिता ने उसे योग्य समझकर पृथ्वी के शासन करने का आदेश दिया। किन्तु, प्रियव्रत ने अपने-आपको भगवान वासुदेव के चरणों में समर्पित कर दिया था। उसे राज्य का तनिक भी लोभ नहीं था। 'कहीं मैं राज्य मिलने पर भगवान की भक्ति छोड़ कर व्यर्थ के सांसारिक प्रपंचों में न पड़ जाऊँ', ऐसा विचारकर उसने अपने पिता की आज्ञा नहीं मानी।
यह देखकर कि संसार और प्रियव्रत के हित में यही है कि प्रियव्रत पहले अपने सांसारिक कर्तव्यों का पालन करे, फिर वैराग्य का मार्ग चुने, ब्रह्मा अपने पार्षदों के साथ प्रियव्रत के पास पहुँचे। उन्होंने उसे समझाते हुए कहा - पुत्र, ईश्वर का विधान है कि मनुष्य अपने शरीर के माध्यम से पहले अपने कर्मों का फल - सुख-दुख भोगे। इसकी अवज्ञा मत करो। जो बुद्धिमान पुरुष अपनी इन्द्रियों को जीत चुका है और अपनी आत्मा में ही रमण करता है, उसका गृहस्थ-जीवन भला क्या बिगाड़ सकता है? जैसे, किले में सुरक्षित रहकर लड़ने वाला राजा अपने प्रबल शत्रुओं को जीत लेता है, उसी तरह जिसे छह शत्रुओं (मन और पाँच इंद्रियाँ) को जीतने की इच्छा है, वह घर में रहकर ही इन पर विजय पाए। यद्यपि तुमने अपने-आपको भगवान की भक्ति-रूपी किले में सुरक्षित कर लिया है, और, इन छह शत्रुओं को जीत भी लिया है, तथापि तुम भगवान के दिए गए कर्मफल भोगो। फिर अपना कर्मफल समाप्त हो जाने पर तुम अपने आत्म- स्वरूप में स्थित हो जाना।
राजा प्रियव्रत ने ब्रह्मा की आज्ञा मान ली और शासन करने लगा।
एक बार उसने यह सोचा कि सूर्य एक बार में केवल पृथ्वी के आधे भाग में ही प्रकाश करता है; उसका आधा भाग अंधकार में रहता है। 'मैं रात को भी दिन बना दूँगा' - ऐसा संकल्प लेकर उसने अपने रथ पर सूर्य के पीछे-पीछे चलते हुए पृथ्वी की सात बार परिक्रमा कर डाली। वह दूसरे सूर्य की तरह ही प्रकाशमान था। उसके रथ के पहियों की लीक से सात समुद्रों और सात द्वीपों की सीमा रेखा खींची गई।
इतने अलौकिक कर्म करते हुए भी प्रियव्रत का मन विषय-वासनाओं से मुक्त था। समय आने पर उसने अपने पुत्रों को विभिन्न द्वीपों का शासन सौंप दिया और स्वयं तप करने वन में चला गया।
(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण, पंचम स्कंध: अध्याय 1 पर आधारित)
श्याम चतुर्वेदी
बहुत सुंदर है
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हटाएंरोचक मनन करने योग्य , नए पहलू !
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
🙏
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