37: राजा भरत की कथा (1)

राजा भरत भगवान के बहुत बड़े भक्त थे। उन्होंने कई वर्षों तक अपनी प्रजा का पालन किया और फिर अपने पुत्रों में राज्य बांट कर स्वयं पुलह-आश्रम, जो गंडकी नदी के किनारे स्थित है, चले गए। वहाँ उन्होंने एकाग्रता के साथ भगवान की आराधना में अपनी सारी शक्ति लगा दी।  

एक दिन भरत जब गंडक के किनारे बैठ कर जप कर रहे थे, वहाँ प्यास से व्याकुल एक हिरणी आई। उसने अभी जल पीना आरंभ ही किया था कि उसे पास ही किसी सिंह की भयानक गर्जना सुनाई दी। इससे घबराकर हिरणी ने नदी में छलांग लगा दी। हिरणी गर्भवती थी। भय और श्रम के प्रभाव से उसके गर्भ से उसका बच्चा निकल कर नदी में गिर गया और हिरणी की भी मृत्यु हो गई। 

ऐसा करुण दृश्य देख कर राजा भरत को बहुत दया आई। उन्होंने झटपट हिरणी के उस बच्चे को नदी से निकाला और उसे अपने साथ आश्रम ले आए। 

वह बच्चा धीरे-धीरे वहाँ आश्रम पर ही बड़ा होने लगा।  राजा भरत को उसकी बहुत चिंता रहती थी। उनका सारा समय अब उस हिरण के बच्चे के लिए खाना-पीना जुटाने, वन के पशुओं से उसकी रक्षा करने और उसकी बाल-सुलभ क्रीड़ा का आनंद लेने में बीतता था। 

समय बीतता गया। राजा भरत को पता ही नहीं चला कि कब उनके हृदय में अब तक विकसित हो रही वैराग्य की भावना को धकेल कर वहाँ हिरण के बच्चे के प्रति आसक्ति ने घर कर लिया। उनसे भगवत-जाप, यम- नियम आदि सारी साधना छूट गई। जिस भरत ने अपना सारा राजपाट, अपने सारे पुत्रों का मोह छोड़ दिया था,  उसी भरत को एक साधारण हिरण के बच्चे के स्नेह ने बाँध लिया! 

जब भरत की मृत्यु का समय आया तो वह हिरण- शावक उनके पास ही बैठा था। उनसे सदा के लिए वियोग की आशंका से वह उसी तरह शोकाकुल था जैसे एक पुत्र होता है। मेरे बाद इसका क्या होगा - यही चिंता करते हुए राजा भरत ने अपने प्राण त्याग दिए।

हिरणशावक के प्रति अंत समय तक इस घोर आसक्ति के कारण भरत को मुक्ति नहीं मिल पाई। उन्होंने अपनी मृत्यु के पश्चात एक हिरण के रूप में जन्म लिया। सौभाग्यवश उनकी अब तक की साधना के कारण इस जन्म में भी पिछले जन्म की स्मृति बनी रही।  उन्होंने निश्चय किया कि वह अब और किसी आसक्ति में नहीं बंधेंगे। उन्होंने अपना परिवार छोड़ दिया और शालग्राम तीर्थ पर चले गए। कहीं मैं फिर न बंध जाऊँ, इस आशंका से वह सदा अकेले रहते थे। समय आने पर उन्होंने अपना मृग-शरीर भी त्याग दिया। 

मृत्यु के बाद भरत का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता शम, दम, तप, स्वाध्याय, त्याग, अतिथि-सेवा, संतोष, धैर्य, विनय, विद्या, अनसूया( किसी में दोष नहीं देखना), आत्मज्ञान एवं आनंद आदि श्रेष्ठ गुणों से युक्त थे। 

भरत को अपने पूर्वजन्म की स्मृति थी। उनके पिता ने उन्हें शिक्षा देने का बहुत प्रयास किया, किंतु भरत अब दुबारा सांसारिक बंधनों में नहीं फंसना चाहते थे।  इसलिए, उन्होंने जानबूझकर मूर्ख होने का नाटक किया। 

(शेष अगले अंक में) 

(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण, पंचम स्कंध: सप्तम- नवम अध्याय पर आधारित)



श्याम चतुर्वेदी 


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