38: राजा भरत की कथा (2)

भरत को शिक्षा देने का मनोरथ लिए ही एक दिन उनके पिता की मृत्यु हो गई। भरत सांसारिक जीवन में न फँस जाएँ, इसके लिए वह जान बूझ कर मूर्ख-जैसा आचरण करते थे। उनके भाई उन्हें सचमुच मूर्ख समझते थे। लोग उन्हें जडभरत कहने लगे। पिता की मृत्यु के बाद यह सोचकर कि भरत का कोई और उपयोग नहीं हो सकता, उनके भाइयों ने उनको खेती-बारी के काम में लगा दिया। भरत को इन बातों की कोई चिंता नहीं थी।  शारीरिक श्रम करने पर उन्हें जो भी रूखा-सूखा भोजन मिल जाता, उसी से अपना गुजारा कर लेते थे। मान-अपमान, सुख-दुख, स्वाद-अस्वाद, आदि का उन्हें कुछ भी ध्यान नहीं था, इस कारण उनका शरीर हृष्ट-पुष्ट था। 

किसी समय डाकुओं के एक सरदार ने पुत्र-प्राप्ति के लिए भद्रकाली को नर-बलि देने का संकल्प लिया। किंतु, दैववश जिस पुरुष को उसने बलि देने के लिए मँगाया था, वह उसकी कैद से निकल भागा। सरदार के सेवक उसकी खोज में हर तरफ भागे, किंतु उसका कहीं भी पता नहीं चला। तभी उनकी दृष्टि रात में वन्य-जीवों से खेत की रक्षा करते भरत पर पड़ी। भरत के दोषरहित शरीर को बलि के सर्वथा योग्य समझकर उन्होंने भरत को ही पकड़ लिया और उन्हें रस्सी से बाँधकर भद्रकाली के मंदिर में ले आए। 

उन डाकुओं ने अपनी परम्परा के अनुसार भरत को स्नान कराया, नए कपड़े पहनाए, चंदन का लेप लगाया, अच्छी तरह से भोजन कराया और भद्रकाली की मूर्ति के सामने उनका सिर झुकाकर बिठा दिया।  उसके बाद जोर-जोर से ढोल बजाकर, देवी की स्तुति करते हुए उनके पुरोहित ने भरत की गर्दन काटने के लिए तीक्ष्ण खड्ग उठाया। भरत बिना किसी भय के चुपचाप बैठे रहे।  

तभी एक चमत्कार हुआ। जब भद्रकाली ने डाकुओं  को इस कुकर्म के लिए उद्यत देखा तो वे क्रोध में भरकर तत्काल मूर्ति को तोड़ते हुए बाहर प्रकट हो गईं। उन्होंने सारे डाकुओं को उन्हीं की तलवार से मार डाला। भरत को मुक्ति मिली। सच है, जो महापुरुषों के प्रति अपराध करता है, उसका वही अपराध उसका भी नाश कर देता है !

भरत के बारे में एक अन्य कथा है। एक बार सिंधु-सौवीर देश का राजा रहूगण अपनी पालकी पर सवार होकर कहीं जा रहा था। रास्ते में भरत मिल गए। राजा के कहारों ने जब भरत के हृष्ट-पुष्ट शरीर को देखा तो उन्हें भी पालकी में जोत दिया। भरत ने इसका कोई विरोध नहीं किया और चुपचाप पालकी उठाकर चलने लगे। 

भरत के हृदय में जीवमात्र के प्रति करुणा थी। इस डर से कि उनके पैरों के नीचे दबकर कोई जीव मर न जाए, उन्हें बचाते हुए वे अपने पैरों को आगे-पीछे और दाहिने-बाएँ रखते हुए चलते थे। इससे राजा की पालकी भी ऊपर नीचे, आड़ी-तिरछी होने लगी। रहूगण ने जब इसका कारण पूछा तो उसके कहारों ने उत्तर दिया कि यह सब नए कहार (भरत) के कारण हो रहा है।  

यदि एक व्यक्ति में कोई दोष हो, और उसे सुधारा नहीं जाए तो वह अपने संपर्क में आने वाले अन्य लोगों को भी दूषित कर सकता है, यह सोच कर राजा ने भरत को सावधान किया। किन्तु, भरत ने उसका कोई उत्तर नहीं दिया और पहले की तरह ही चलते रहे।  तब राजा ने क्रोध से भरकर भरत को कहा - क्या तुम्हें मेरा थोड़ा- सा भी भय नहीं है? ठहर, मैं तेरी इस धृष्टता के लिए अभी दंड देता हूँ। 

जडभरत ने राजा की बात सुनकर मुस्कुरा कर कहा  - राजन! तुम्हारा सारा अभिमान केवल इस भेद-बुद्धि के कारण है कि तुम स्वयं को राजा समझते हो और हमें अपना सेवक। परमार्थ की दृष्टि से देखा जाए तो कौन राजा है और कौन सेवक? मैं देह और बुद्धि से परे हूँ। मुझे तो कहीं कोई भेद नहीं दिखाई देता। रही बात मुझे दंड देने की - तो, यदि मैं वास्तव में मूर्ख और प्रमादी हूँ, तो भी मुझे दंड देने का कोई लाभ नहीं होगा। जो स्वयं ही पिसा हुआ है, उसे और क्या पीसना!

यह कहकर भरत चुप हो गए और पहले की भांति पालकी अपने कंधे पर रखकर चलने लगे।  

राजा रहूगण के संस्कार अच्छे थे। भरत के वचनों का सत्य उसके हृदय को झकझोर गया।  ' यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं हो सकता ' - यह सोचते हुए राजा तत्काल अपनी पालकी से उतर पड़ा और उसने भरत के पैर पकड़ लिए। रहूगण बोला  - देव! संसार से इस तरह अपने-आप को छुपा कर चलने वाले आप कौन हैं? आप कहीं दत्तात्रेय आदि अवधूतों में से एक तो नहीं हैं? आप कहीं साक्षात् भगवान कपिल तो नहीं? आप जो भी हों,  कृपया मुझे वह ज्ञान दीजिए जिसके मैं योग्य हूँ।  

भरत बोले - राजन! अपने मन को समझो। हमारा मन ही हमारी आसक्ति और मोक्ष दोनों का साधन होता है। विषयों में आसक्त मन दुख देता है, और विषयों से मुक्त हो जाने पर यही मन हमें परम पद दे देता है। जबतक दीपक में घी रहता है, उसकी बत्ती धुआँ और प्रकाश देती हुई जलती रहती है, और घी के समाप्त हो जाने पर उसकी अग्नि भी अग्नि तत्त्व में ही विलीन हो जाती है। ठीक इसी तरह, विषयों में आसक्ति समाप्त हो जाने पर मन भी अनंत सत्ता में लीन हो जाता है। 


(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण, पंचम स्कंध पर आधारित)

श्याम चतुर्वेदी 




टिप्पणियाँ

  1. हमेशा की तरह ज्ञानवर्धक और गहरे सवालों को उठाते हुए लेख। मैंने इसको ऐसे पढ़ा - भरत बोले - राजन! अपने मन को समझो।, और सवाल उठ खड़े हुए कि — को नाम बन्धः, कथमेष आगतः, कथं प्रतिष्ठास्य, कथं विमोक्षः, कोऽसावनात्मा, परः क आत्मा, तयोर्विवेकः कथम्?"

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    1. धन्यवाद। मेरा प्रयास यही रहता है कि श्रीमद्भागवत के दुरूह दर्शन को सरल शब्दों में सबके सामने रखा जाए।





      श्याम चतुर्वेदी



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