39: जडभरत एवं रहूगण का संवाद
राजा रहूगण ने कहा - हे योगेश्वर! आपने परमतत्त्व के बारे में मुझे जो उपदेश दिए, उन्हें मैं नहीं समझ सका। कृपया आप उन्हें सरल शब्दों में समझाएँ।
जडभरत बोले - राजन! यदि गहराई से देखा जाए तो सब कुछ पृथ्वी से बना है। चाहे वह पत्थर हो अथवा कहार या पालकी या पालकी में बैठे हुए तुम - सब कुछ पृथ्वी से ही उत्पन्न विभिन्न रूप हैं। काल आने पर इन सबको पुनः पृथ्वी में विलीन हो जाना है। किंतु तुम्हारी सीमित बुद्धि वर्तमान देह से परे कुछ देख नहीं पाती। इसी कारण तुम स्वयं को राजा समझते हो। एक तरफ तो तुम स्वयं को प्रजा का रक्षक बताते हो और दूसरी तरफ अपनी क्षणिक सुविधा के लिए इन बेचारे कहारों का शोषण करने में तुम्हें तनिक भी लाज नहीं आती।
राजन! पृथ्वी भी अंतिम सत्य नहीं है। यह स्वयं कई परमाणुओं से मिलकर बनी है। दूसरी तरफ, परमाणुओं में भी काल और कर्म के अनुसार विकार होता है। इन सभी के पीछे एकमात्र परमात्मा की सत्ता ही परम सत्य है जिसमें कभी कोई विकार नहीं होता।
इसके बाद जडभरत ने राजा रहूगण को संसार के बारे में समझाते हुए कहा - राजन! इस संसार को एक वन की तरह समझो। विभिन्न जीव इसमें व्यापरियों के समूह की तरह विचरण करते हैं। इस वन में एक तरफ तो अनेक प्रकार के हिंसक जंतु हैं, डाकू हैं और दूसरी तरफ सुख का भ्रम उत्पन्न करने वाला मायावी नगर भी है। सुख और लाभ की चाह लिए जीव निरंतर वन में भटकते रहते हैं। कभी प्यास लगने पर ये मृगतृष्णा की ओर भागते हैं, तो कभी धन की कमी होने पर आपस में ही लड़ाई करने लगते हैं । किसी जीव ने बहुत परिश्रम करके अपने अच्छे कर्मों द्वारा जो धन अर्जित किया होता है, उसकी थोड़ी-सी असावधानी होते ही छह डाकुओं का समूह (मन और पाँच इन्द्रियाँ) उसका सबकुछ लूट लेता है। अपने परिवार के सदस्यों, मित्रों के कारण कभी जीव सुख पाता है, तो कभी ये लोग ही उसके दुख का कारण बन जाते हैं। इस भयानक संसार रूपी वन से मुक्ति पाने का एक ही रास्ता है - भगवान के भक्तों की संगति करना।
इस तरह जडभरत के उपदेशों ने राजा रहूगण को परम तत्त्व की ओर बढ़ने को प्रेरित किया ।
(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण, पंचम स्कंध, अध्याय 12-14 पर आधारित)
श्याम चतुर्वेदी
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