41. दक्ष द्वारा नारद को शाप
ब्रह्मा ने अपनी मानसिक शक्ति से नौ प्रजापतियों की सृष्टि की। उनमें से एक का नाम दक्ष प्रजापति था। दक्ष के कई पुत्र हुए। उसने अपने पुत्रों को सृष्टि का और आगे विस्तार करने की आज्ञा दी।
दक्ष के पुत्रों ने पिता की आज्ञा मानकर अच्छी संतान की सृष्टि के उद्देश्य से तपस्या करने के लिए सिंधु-तट पर स्थित नारायण-सर तीर्थ की ओर प्रस्थान किया। अनेक महात्माओं के निवास एवं तप के कारण यह एक बहुत पवित्र तीर्थ था। वहाँ दक्ष के पुत्रों में तीर्थ के प्रभाव और अपनी तपस्या के कारण भगवान के प्रति अतीव भक्ति हो गई। किंतु, पिता की आज्ञावश वे संतान की इच्छा से तप करते रहे।
जब नारद ने उन्हें इस तरह तप करते देखा तो उनके सामने आकर उन्होंने एक पहेली में यह बात कही - जब तुम लोगों ने पृथ्वी का अंत ही नहीं देखा तो फिर सृष्टि क्या करोगे? देखो, एक ऐसा देश है जिसमें केवल एक ही पुरुष का निवास है। एक ऐसी सुरंग है जिससे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं। एक ऐसी नदी है जो आगे-पीछे दोनों तरफ बहती है। एक हंस है जिसकी कथा बड़ी विचित्र है। तेज छूरों और वज्र से बना हुआ एक चक्र है जो अपने-आप घूमता रहता है। तुमने क्या अपने पिता के आदेश को ठीक से समझा है? जब तक तुम लोगों ने ये सारे रहस्य समझ नहीं लिए तुम भला किस तरह की सृष्टि करोगे?
दक्ष के पुत्र बहुत बुद्धिमान थे। उन्होंने आपस में विचार किया - नारद मुनि के गूढ वचनों का अभिप्राय क्या है? निश्चय ही यह शरीर पृथ्वी है जो जीव का कर्मक्षेत्र है। जब तक इस शरीर की सीमा (विनाशशीलता) का बोध नहीं हो जाए, तब तक सकाम कर्मों को करते रहने से क्या लाभ हो सकता है? संपूर्ण सृष्टि में बस एक ही पुरुष अर्थात् ईश्वर ही तो है जो प्रत्येक जीव में और प्रत्येक कण में विद्यमान है। सुरंग का आशय वह मार्ग है जिससे चलकर जीव जब भगवान को पा लेता है तो वहाँ से वह पुनः नहीं लौटता। माया ही दोनों ओर बहने वाली नदी है। यही सृष्टि और संहार दोनों ओर प्रवाहित होती है। माया का ज्ञान हो जाए तो यह मुक्ति की ओर ले जाती है और माया यदि समझ में नहीं आए तो बंधन की ओर। हंस उस पुरुष का प्रतीक है जिसमें नीर-क्षीर विवेक है। निरंतर घूमता हुआ चक्र वस्तुतः कालचक्र है जिसके तीखे प्रहार से कोई नहीं बच सकता। नारद जी जिस पिता की ओर संकेत कर रहे हैं, वह वास्तव में उनके पिता दक्ष नहीं है। यहाँ शास्त्रों को पिता कहा गया है। और, शास्त्रों का आदेश कर्मों के बंधन में पड़ना नहीं बल्कि उनसे मुक्त होना है।
नारद के वचनों का ऐसा अर्थ लगाकर दक्ष के पुत्रों ने भौतिक संतान-उत्पत्ति का सारा विचार छोड़कर स्वयं को भगवान की भक्ति में समर्पित कर दिया।
जब दक्ष को इस बात का पता चला कि उसके शीलवान पुत्र नारद के उपदेश के कारण संतान-उत्पत्ति का विचार त्याग चुके हैं तो उसे बहुत दुख हुआ। उसने सोचा - कई बार अच्छी संतान का होना भी शोक का विषय हो जाता है!
ब्रह्मा ने दक्ष को सांत्वना दी। उनके समझाने-बुझाने पर दक्ष ने फिर अपने दूसरे पुत्रों को प्रजा-सृष्टि का आदेश दिया। ये पुत्र भी नारायण-सर गए और उन्होंने तप आरंभ कर दिया। नारद उनके पास आए और उन्हें भी वही बात सुनाई जो उनके भाइयों को सुनाई थी। नारद ने कहा - पुत्रो! तुम लोग भी अपने बड़े भाइयों के मार्ग का अनुसरण करो। दक्ष के इन पुत्रों ने भी वैसा ही किया।
यह समाचार पाकर दक्ष के क्रोध का ठिकाना नहीं रहा। उसने नारद को कहा - अरे दुष्ट! तुमने हमारे सारे बालकों को भिक्षुओं के मार्ग पर चलाकर बड़ा बुरा किया। अभी तो उन्हें ब्रह्मचर्य और गृहस्थ आश्रम के कई कर्म करने थे और समाज एवं परिवार के प्रति विभिन्न ऋण उतारने थे। उन्हें स्वयं विषयों को भोगकर उनकी नश्वरता को समझ कर वैराग्य लेना था। किंतु, तुमने उन्हें समझा-बुझाकर हठात् वैराग्य के मार्ग पर ठेल दिया। यदि हमारी सारी संतानें वैराग्य मार्ग ही अपना लें तो हमारी वंश-परंपरा नष्ट हो जाएगी। संसार की सृष्टि का क्या होगा? तुमने यह छोटी-सी बात क्यों नहीं समझी? मूढ़! मैं तुम्हें शाप देता हूँ - आज के बाद तुम किसी एक स्थान पर कभी ठहर नहीं सकोगे। तुम्हारा सारा जीवन संपूर्ण ब्रह्मांड में एक स्थान से दूसरे स्थान तक भ्रमण करते ही व्यतीत होगा!
नारद ने विनम्रतापूर्वक "बहुत अच्छा" कहकर दक्ष का शाप स्वीकार कर लिया। दक्ष को नारद भी शाप दे सकते थे, किंतु उन्होंने वैसा नहीं किया। प्रतिशोध लेने की क्षमता होते हुए भी जो दूसरों का अपकार सहन कर ले, वही सच्चा साधु है।
(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण, षष्ठ स्कंध पर आधारित)
श्याम चतुर्वेदी
Behad sundar prasang or vyakhan.
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