42. ऋषि दधीचि का महान त्याग
देवताओं के राजा इंद्र को अपनी सत्ता का बहुत घमंड हो गया था। उसने उचित-अनुचित का ध्यान करना छोड़ दिया था। एक दिन जब वह अपनी सभा में अपने दरबारियों के साथ बैठा हुआ अपनी प्रशंसा से भरे गीत सुनने में मग्न था, वहाँ देवताओं के गुरु बृहस्पति पधारे। बृहस्पति का सुर और असुर दोनों सम्मान करते थे। किंतु, उस दिन सत्ता के मद में चूर इंद्र ने अपने गुरु का न अभिवादन किया न ही उन्हें बैठने के लिए कोई आसन दिया। बृहस्पति ने समझ लिया कि इंद्र में सत्ता के ऐश्वर्य का दोष आ गया है। वे चुपचाप वहाँ से बाहर निकल आए।
बृहस्पति के जाने के बाद इंद्र को अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने और सभी देवताओं ने अपने गुरु को बहुत ढूँढा, किंतु वे कहीं नहीं मिले। इधर जब असुरों को इंद्र और उसके गुरु बृहस्पति की अनबन का पता चला तो उन्होंने इसे उचित अवसर समझकर स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया। देवताओं को उचित निर्देशन देने वाला कोई गुरु नहीं था। इसलिए युद्धभूमि में वे असुरों के सामने टिक नहीं पाए।
जब युद्ध में देवताओं की भारी क्षति होने लगी तो वे घबराकर ब्रह्मा की शरण में गए। ब्रह्मा ने उन्हें परामर्श दिया कि वे त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप ऋषि के पास जाकर उन्हें अपना गुरु बनने की प्रार्थना करें। देवताओं ने विश्वरूप के आश्रम जाकर उनसे प्रार्थना की कि वे उनके गुरु बन जाएँ। विश्वरूप युवा थे और तपस्वी थे। उन्होंने देवताओं की कहानी सुनकर कहा - देवताओ! मैं तपस्वी हूँ। खेतों में फसल कट जाने पर अथवा अनाज की हाट उठ जाने पर भूमि पर जो थोड़े-बहुत दाने गिर जाते हैं, उन्हें चुनकर और खाकर मेरा काम चल जाता है। फिर मैं आप लोगों का गुरु क्यों बनूँ? राजसत्ता के साथ जुड़ते ही मनुष्य की सारी तपस्या क्षीण होने लगती है।
किंतु बाद में, देवताओं के बहुत अनुनय-विनय करने पर विश्वरूप ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। उनके परामर्श के अनुसार युद्ध करने से देवताओं को असुरों के विरुद्ध युद्ध में विजय मिली।
विश्वरूप के पिता त्वष्टा आदित्य थे और उनकी माता असुर कुल की थीं। एक बार देवताओं का यज्ञ करते हुए विश्वरूप ने मातृ-स्नेह के कारण देवताओं के साथ-साथ असुरों को भी यज्ञ के पुण्य का भाग देना आरंभ कर दिया। इंद्र ने जब यह देखा कि इस तरह यज्ञ के पुण्य के प्रभाव से असुरों की शक्ति बढ़ जाएगी, तो उसने तत्काल विश्वरूप का सिर काट दिया।
विश्वरूप की इस तरह इंद्र के हाथों मृत्यु का समाचार पाते ही उनके पिता त्वष्टा के क्रोध का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने यज्ञ की अग्नि से वृत्रासुर नामक एक भयानक दैत्य प्रकट किया और उसे आदेश दिया - हे इंद्र के शत्रु! जाओ और अपने शत्रु को शीघ्रातिशीघ्र मार डालो!
वृत्रासुर अपने त्रिशूल को लहराता हुआ देवताओं की ओर चल पड़ा। उसे आते देख देवताओं ने उस पर अपने समस्त शस्त्रों का प्रयोग किया किंतु उसके ऊपर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ा।भयभीत देवताओं ने तब भगवान की शरण ली। भगवान ने उनकी यह अवस्था देखकर उनसे कहा - तुम लोगों का कल्याण हो! देवराज इंद्र! तुम ऋषि दधीचि के पास जाकर उनसे उनका शरीर माँगो। उपासना, व्रत और तपस्या के कारण उनके शरीर में अद्भुत शक्ति आ गई है। उनके शरीर की अस्थियों से विश्वकर्मा के द्वारा एक अस्त्र तैयार कर लो। इस अस्त्र से तुम वृत्रासुर को पराजित कर पाओगे।
ऋषि दधीचि का एक नाम 'अश्वशिर' भी है। इसके पीछे की कथा इस प्रकार है - एक बार अश्विनीकुमारों ने, जो देवताओं के वैद्य हैं, ऋषि दधीचि से ब्रह्मज्ञान देने की प्रार्थना की। दधीचि ने उन्हें यह कह कर लौटा दिया - मैं इस समय एक आवश्यक कार्य में व्यस्त हूँ। तुम लोग बाद में आना।
अश्विनीकुमारों के जाते ही इंद्र वहाँ आया।उसने ऋषि को कहा - अश्विनीकुमार वैद्य हैं। यदि आपने उन्हें ब्रह्मविद्या दी तो मैं आपका सिर काट डालूँगा।
इंद्र के जाने के कुछ समय बाद जब अश्विनीकुमार पुनः आए तो उन्हें दधीचि ने यह बात बताई। अश्विनीकुमारों ने कहा - आप चिंतित न हों। हमारे पास इसका एक उपाय है। हम पहले ही आपका सिर काटकर वहाँ एक घोड़े का सिर लगा देंगे। आप इस अश्व के मुख से हमें ब्रह्मज्ञान का उपदेश करें। आपके ऐसा करने पर इंद्र आपका घोड़े का सिर काट देगा। तब हम पुनः आपका असली सिर जोड़ देंगे।
दधीचि ने वैसा ही किया। इस प्रकार एक अश्व के सिर से उपदेश किए जाने के कारण ब्रह्म-विद्या का नाम 'अश्वशिरा' पड़ा।
भगवान की आज्ञा पाकर देवराज इंद्र समेत सारे देवता दधीचि के आश्रम पहुँचे। उन्होंने जब ऋषि से उनका शरीर माँगा तो दधीचि ने हँसते हुए कहा - आपने कभी यह सोचा नहीं कि किसी मनुष्य के लिए उसका अपना शरीर त्यागना कितना कठिन होता है। स्वयं भगवान भी यदि किसी से उसका शरीर माँगे तो भी कोई नहीं देना चाहेगा।
देवता बोले - ब्रह्मन्! इसमें कोई संदेह नहीं कि माँगने वाले लोग बहुत स्वार्थी होते हैं। वे कभी यह नहीं सोचते कि देने वाले को कितनी कठिनाई हो सकती है। यदि वे जानते तो कभी माँगते नहीं। इसी प्रकार, देने वाला भी माँगने वाले की विपत्ति को नहीं जानता। अगर वह जान पाता तो कभी भी अपने मुख से 'नहीं' नहीं कहता। हम पर घोर विपत्ति आ पड़ी है। आप कृपया अपना शरीर देकर हमारी रक्षा करें।
दधीचि ने हँसकर कहा - आप लोगों के मुख से धर्म की बातें सुनकर अच्छा लगा। सच तो यह है कि इस विनाशी शरीर का मुझे कभी मोह नहीं रहा। यह लो, मैं इसी समय अपना शरीर छोड़ देता हूँ।
ऋषि के शरीर की हड्डियों से देवताओं के कारीगर विश्वकर्मा ने कई अस्त्र-शस्त्र बनाए। उनमें से प्रमुख अस्त्र का नाम था - वज्र, जिसे इंद्र ने धारण किया। इन दिव्य अस्त्रों के बल पर देवताओं ने वृत्रासुर को पराजित किया।
(मूल ग्रंथ श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित)
श्याम चतुर्वेदी
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