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सत्रह: विदुर की उद्धव से भेंट

(गतांक से आगे) हस्तिनापुर से निकल कर विदुर तीर्थयात्रा पर चल पड़े। उन्होंने अवधूत-वेश धारण कर लिया जिससे उन्हें कोई पहचान नहीं सके। उनकी दिनचर्या बहुत संयमित थी। उनका भोजन सदा साधारण और पवित्र होता था। वे भूमि पर सोते थे। भगवान को जिससे प्रसन्नता मिले, वे उन समस्त आवश्यक व्रतों का पालन किया करते थे। विभिन्न तीर्थों में विचरण करते हुए जब वे प्रभास-क्षेत्र पहुँचे तो वहाँ उन्हें महाभारत युद्ध के बारे में सूचना मिली। युद्ध समाप्त हो गया था और अपने पीछे इतिहास में कभी न मिटने वाली भयानक विनाश की लकीर खींच गया था। कौरव मारे जा चुके थे। राज्य की बागडोर अब युधिष्ठिर के हाथों में थी। वहाँ से चल कर विदुर यमुना-तट पर पहुँचे जहाँ उनकी भेंट उद्धव से हुई। उद्धव अपने शैशव काल से ही भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त थे। दोनों भक्त बहुत प्रेम से मिले। विदुर ने अधीरतापूर्वक भगवान श्रीकृष्ण, उनके स्वजनों, उनकी प्रजा की कुशलता के बारे में पूछा। साथ ही, उन्होंने पांडवों का समाचार भी सुनना चाहा।  विदुर के प्रश्नों की झड़ी से उद्धव को अपने आराध्य की तीव्र स्मृति हो आई। वे भावविह्वल होकर कर कहीं खो गए। धीरे-धीर...

सोलह: विदुरजी ने युद्ध में भाग क्यों नहीं लिया?

राजा परीक्षित ने शुकदेवजी से अनुरोध किया - प्रभो! आप कृपया हमें महात्मा विदुरजी का चरित्र सुनायें। उन्होंने क्यों अपना सुख-सुविधापूर्ण घर-बार छोड़ दिया और तीर्थयात्रा पर निकल गये? तीर्थयात्रा के समय उनकी भेंट किन-किन महात्माओं से हुई और उनमें क्या बातें हुईं? शुकदेवजी बोले - हे राजन! धृतराष्ट्र पुत्र-प्रेम में अंधा था। वह नीति-अनीति में भेद करने की क्षमता खो चुका था। उसने पांडवों को लाक्षागृह में आग लगाकर मार देना चाहा। उसने भरी सभा में उनकी पत्नी द्रौपदी को अपमानित करने से भी अपने पुत्रों को नहीं रोका। उसने अन्याय से पांडवों का सारा राज्य द्यूत में जीतकर उन्हें वनवास दे दिया। पाण्डु पुत्रों ने धृतराष्ट्र का सारा अन्याय धैर्य के साथ सहा। वन से लौटने के  बाद जब उन्होंने धृतराष्ट्र से अपना न्यायोचित राज्य माँगा तो धृतराष्ट्र ने उन्हें वह नहीं दिया। यहाँ तक कि जब भगवान श्रीकृष्ण पांडवों का दूत बनकर शांति प्रस्ताव लेकर धृतराष्ट्र की राजसभा में गए, तब भी उसकी बुद्धि नहीं खुली। भगवान का प्रस्ताव सभी के हित में था, किन्तु धृतराष्ट्र ने उसका सम्मान नहीं किया। वह करता भी कैसे, उसके सारे पुण...

पंद्रह: परीक्षित द्वारा सृष्टि-विषयक प्रश्न

परीक्षित ने शुकदेवजी से जिज्ञासा की - हे पवित्र और सर्वज्ञ मुनिवर! भगवान इस सृष्टि की रचना, रक्षा और संहार कैसे करते हैं? शुकदेवजी ने उत्तर दिया  - हे राजन! एक बार नारदजी ने अपने पिता ब्रह्माजी से यही प्रश्न किया था। ब्रह्माजी ने तब यह उत्तर दिया था - पुत्र नारद! ऊपर से यही प्रतीत होता है कि मैं इस सृष्टि की रचना करता हूँ। किंतु, मैं भी स्वतंत्र नहीं हूँ। मैं उन नारायण के अधीन हूँ जो सबके स्वामी हैं। उनका न तो आदि है न ही अंत। वे शाश्वत, शांत, अभय और परम ज्ञान स्वरूप हैं। वे त्रिगुणातीत और मायातीत हैं। उन्होंने केवल संसार की सृष्टि, रक्षा और संहार के लिए क्रमशः रजोगुण, सतोगुण और तमोगुण को स्वीकार किया है। उन्हीं की प्रेरणा से मैं जगत की सृष्टि करता हूँ। वे स्वयं विष्णु रूप में इसका पालन करते हैं। और, उन्हीं के अधीन  होकर शिवजी इसका विनाश करते हैं। श्याम चतुर्वेदी 

चौदह: शुकदेवजी का आगमन

(पिछले अंक में आपने पढ़ा - राजा परीक्षित को ऋषि शमीक के प्रति अकारण दुर्व्यवहार के कारण ऋषिकुमार श्रृंगी ने शाप दिया कि उस घटना के ठीक सातवें दिन तक्षक नामक साँप के डस लेने से उनकी मृत्यु हो जाएगी। अपराध-बोध से ग्रस्त राजा ने इस शाप की सूचना पाते ही अपना राजपाट अपने पुत्र को सौंपा और आमरण अनशन का व्रत लेकर आत्मशुद्धि के लिए गंगा तट पर बैठ गए।) राजा परीक्षित के आमरण अनशन का समाचार मिलते ही विभिन्न दिशाओं से ऋषि-मुनि अपने-अपने शिष्यों के साथ गंगा तट पर पधारने लगे। इनमें अत्रि, वसिष्ठ, च्यवन, शरद्वान, अरिष्टनेमि, भृगु, अंगिरा, पराशर, विश्वामित्र, परशुराम, भारद्वाज, गौतम, उतथ्य, इन्द्रप्रमद, इध्मवाह, मेधातिथि, देवल, अर्ष्टिषेण, और्व, कवष, पिप्पलाद, मैत्रेय, अगस्त्य, नारद, व्यास आदि सारे महान ऋषि सम्मिलित थे। संतजनों के आगमन से वह स्थल एक तीर्थस्थल बन गया।  राजा ने आदरसहित सारे ऋषियों का सत्कार किया और उनसे दो जिज्ञासाएँ की -  प्रथम, सामान्य परिस्थितियों में जीव के क्या कर्तव्य हैं? द्वितीय, जिस जीव की मृत्यु उसके निकट आ गई हो, उसके क्या कर्तव्य हैं? ऋषियों ने राजा परीक्षित के आमरण ...