संदेश

40: अजामिल की कथा

 किसी समय कन्नौज नगरी में अजामिल नामक एक व्यक्ति रहता था। वह शास्त्रों का जानकार, सदाचारी, सबका हित चाहने वाला और सबका उपकार करने वाला था। किंतु, बाद में बुरी संगति में पड़कर उसने अपनी पत्नी का त्याग कर दिया एवं एक अन्य स्त्री के साथ रहने लगा। उसने उस स्त्री को प्रसन्न रखने के लिए अपनी समस्त पैतृक संपत्ति लुटा दी। यही नहीं, वह उसके लिए अन्यायपूर्ण, धर्म-निषिद्ध तरीकों से धन भी जुटाने लगा। बिना सोचे-समझे यही सब करता वह एक दिन बूढ़ा हो गया। उसके जीवन का अंतिम दिन भी आ पहुँचा। उसने देखा कि उसे लेने के लिए भयानक यमदूत अपने हाथों में रस्सियाँ लिए उसके सामने आ गए हैं। अपनी मृत्यु को अचानक इस तरह अपने सामने देखकर उसने भय से व्याकुल होकर अपने बच्चे को जोर से पुकारा- "नारायण! नारायण!" उसके दस बच्चों में सबसे छोटे बच्चे का नाम नारायण था, जिसे वह सबसे अधिक प्रेम करता था।  भगवान के पार्षदों ने जब यह सुना कि अजामिल ने भगवान का नाम पुकारा है, तो वे अविलंब उसके सामने उपस्थित हो गए। उस समय यमदूत अजामिल के शरीर से उसके सूक्ष्म शरीर को खींच रहे थे। भगवान के पार्षदों ने यमदूतों को ऐसा करने से ब...

39: जडभरत एवं रहूगण का संवाद

 राजा रहूगण ने कहा  - हे योगेश्वर! आपने परमतत्त्व के बारे में मुझे जो उपदेश दिए, उन्हें मैं नहीं समझ सका। कृपया आप उन्हें सरल शब्दों में समझाएँ।  जडभरत बोले  - राजन! यदि गहराई से देखा जाए तो सब कुछ पृथ्वी से बना है। चाहे वह पत्थर हो अथवा कहार या पालकी या पालकी में बैठे हुए तुम  - सब कुछ पृथ्वी से ही उत्पन्न विभिन्न रूप हैं। काल आने पर इन सबको पुनः पृथ्वी में विलीन हो जाना है। किंतु तुम्हारी सीमित बुद्धि वर्तमान देह से परे कुछ देख नहीं पाती। इसी कारण तुम स्वयं को राजा समझते हो। एक तरफ तो तुम स्वयं को प्रजा का रक्षक बताते हो और दूसरी तरफ अपनी क्षणिक सुविधा के लिए इन बेचारे कहारों का शोषण करने में तुम्हें तनिक भी लाज नहीं आती।  राजन! पृथ्वी भी अंतिम सत्य नहीं है। यह स्वयं कई परमाणुओं से मिलकर बनी है। दूसरी तरफ, परमाणुओं में भी काल और कर्म के अनुसार विकार होता है। इन सभी के पीछे एकमात्र परमात्मा की सत्ता ही परम सत्य है जिसमें कभी कोई विकार नहीं होता। इसके बाद जडभरत ने राजा रहूगण को संसार के बारे में समझाते हुए कहा  - राजन! इस संसार को एक वन की तरह समझो। वि...

38: राजा भरत की कथा (2)

भरत को शिक्षा देने का मनोरथ लिए ही एक दिन उनके पिता की मृत्यु हो गई। भरत सांसारिक जीवन में न फँस जाएँ, इसके लिए वह जान बूझ कर मूर्ख-जैसा आचरण करते थे। उनके भाई उन्हें सचमुच मूर्ख समझते थे। लोग उन्हें जडभरत कहने लगे। पिता की मृत्यु के बाद यह सोचकर कि भरत का कोई और उपयोग नहीं हो सकता, उनके भाइयों ने उनको खेती-बारी के काम में लगा दिया। भरत को इन बातों की कोई चिंता नहीं थी।  शारीरिक श्रम करने पर उन्हें जो भी रूखा-सूखा भोजन मिल जाता, उसी से अपना गुजारा कर लेते थे। मान-अपमान, सुख-दुख, स्वाद-अस्वाद, आदि का उन्हें कुछ भी ध्यान नहीं था, इस कारण उनका शरीर हृष्ट-पुष्ट था।  किसी समय डाकुओं के एक सरदार ने पुत्र-प्राप्ति के लिए भद्रकाली को नर-बलि देने का संकल्प लिया। किंतु, दैववश जिस पुरुष को उसने बलि देने के लिए मँगाया था, वह उसकी कैद से निकल भागा। सरदार के सेवक उसकी खोज में हर तरफ भागे, किंतु उसका कहीं भी पता नहीं चला। तभी उनकी दृष्टि रात में वन्य-जीवों से खेत की रक्षा करते भरत पर पड़ी। भरत के दोषरहित शरीर को बलि के सर्वथा योग्य समझकर उन्होंने भरत को ही पकड़ लिया और उन्हें रस्सी से बाँधकर...

37: राजा भरत की कथा (1)

राजा भरत भगवान के बहुत बड़े भक्त थे। उन्होंने कई वर्षों तक अपनी प्रजा का पालन किया और फिर अपने पुत्रों में राज्य बांट कर स्वयं पुलह-आश्रम, जो गंडकी नदी के किनारे स्थित है, चले गए। वहाँ उन्होंने एकाग्रता के साथ भगवान की आराधना में अपनी सारी शक्ति लगा दी।   एक दिन भरत जब गंडक के किनारे बैठ कर जप कर रहे थे, वहाँ प्यास से व्याकुल एक हिरणी आई। उसने अभी जल पीना आरंभ ही किया था कि उसे पास ही किसी सिंह की भयानक गर्जना सुनाई दी। इससे घबराकर हिरणी ने नदी में छलांग लगा दी। हिरणी गर्भवती थी। भय और श्रम के प्रभाव से उसके गर्भ से उसका बच्चा निकल कर नदी में गिर गया और हिरणी की भी मृत्यु हो गई।  ऐसा करुण दृश्य देख कर राजा भरत को बहुत दया आई। उन्होंने झटपट हिरणी के उस बच्चे को नदी से निकाला और उसे अपने साथ आश्रम ले आए।  वह बच्चा धीरे-धीरे वहाँ आश्रम पर ही बड़ा होने लगा।  राजा भरत को उसकी बहुत चिंता रहती थी। उनका सारा समय अब उस हिरण के बच्चे के लिए खाना-पीना जुटाने, वन के पशुओं से उसकी रक्षा करने और उसकी बाल-सुलभ क्रीड़ा का आनंद लेने में बीतता था।  समय बीतता गया। राजा भरत को...

36: राजा ऋषभदेव का अपने पुत्रों को उपदेश

एक बार ऋषभदेव ने अपनी प्रजा के कल्याण के लिए सबके सामने अपने पुत्रों को शिक्षा देते हुए कहा - पुत्रों! यह मनुष्य-शरीर विषयभोगों के लिए नहीं होना चाहिए। इन्द्रियों के भोग तो पशुओं को भी मिलते हैं। जब तक मनुष्य अपनी इन्द्रियों के विषयों में लिप्त रहता है, उसके दुख का अंत नहीं हो सकता। वह जन्म-मृत्यु के चक्र में पड़ा रहता है। बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह भगवान के निरंतर ध्यान-मनन से, सांसारिक विषयों में वैराग्य की भावना से, सकाम कर्म छोड़कर निष्काम भक्ति से, सर्वत्र भगवान की ही सत्ता देखने के अभ्यास से अपने सांसारिक बंधन काट डाले। पुत्रों! महापुरुषों की सेवा करो। यही मुक्ति का द्वार है। महापुरुष वे हैं जो समानचित्त, परमशान्त, क्रोधहीन, सबके शुभचिंतक और सदाचार संपन्न हैं। वृक्ष श्रेष्ठ हैं। वृक्षों से पशु श्रेष्ठ हैं। पशुओं से मनुष्य, मनुष्यों से गंधर्व, गंधर्वों से किन्नर, किन्नरों से असुर और असुरों से देवता श्रेष्ठ हैं। रुद्र देवताओं में श्रेष्ठ हैं। क्योंकि रुद्र की उत्पत्ति ब्रह्मा से हुई है, इसलिए ब्रह्मा उनसे श्रेष्ठ हैं। ब्रह्मा की उत्पत्ति मुझसे हुई है, इसलिए मैं उनसे श्रेष्ठ हू...

35: राजा ऋषभदेव की कथा (भाग-1)

प्रियव्रत के वंश में राजा आग्नीध के नौ पुत्र हुए।  उनमें से एक का नाम नाभि था। नाभि बहुत प्रजावत्सल और प्रतापी राजा था। दुर्भाग्यवश, उसकी कोई संतान नहीं थी। उसने अपनी पत्नी मेरुदेवी के साथ संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ किया। पति-पत्नी की श्रद्धा और भक्ति को देख कर उन्हें वर देने के लिए भगवान अपने चतुर्भुज रूप में उनके सामने प्रकट हुए।   यज्ञ में उपस्थित ऋत्विजों ने भगवान की स्तुति की और कहा - प्रभो! आपसे हम यही वर माँगते हैं कि गिरने, ठोकर खाने, छींकने, जंभाई लेने, संकट के समय, ज्वर अथवा जीवन के अंतिम क्षणों में भी हम आपके नाम का स्मरण कर सकें।  उन्होंने आगे कहा  - हे प्रभो! आपसे हमारी एक और प्रार्थना है। आप परम परमेश्वर हैं। इसलिए, आपके लिए ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो आप दे न सकें। किन्तु, जैसे एक अल्पबुद्धि कंगाल व्यक्ति किसी धनी दाता के सामने आकर भी उससे कोई बहुमूल्य वस्तु न माँग कर भूसा माँगे, उसी तरह हमारे यजमान नाभि भी आपसे एक बहुत तुच्छ वस्तु चाहते हैं। उनकी कोई संतान नहीं है। उनकी यही अभिलाषा है कि उन्हें आपके समान गुणों वाला एक पुत्र मिले। हम और क्या कहें, न...

34 : राजा प्रियव्रत की कथा

स्वायंभुव मनु के दो पुत्र थे  -  उत्तानपाद और प्रियव्रत।प्रियव्रत सर्वगुण-संपन्न था। उसके पिता ने उसे योग्य समझकर पृथ्वी के शासन करने का आदेश दिया। किन्तु, प्रियव्रत ने अपने-आपको भगवान वासुदेव के चरणों में समर्पित कर दिया था। उसे राज्य का तनिक भी लोभ नहीं था। 'कहीं मैं राज्य मिलने पर भगवान की भक्ति छोड़ कर व्यर्थ के सांसारिक प्रपंचों में न पड़ जाऊँ', ऐसा विचारकर उसने अपने पिता की आज्ञा नहीं मानी।  यह देखकर कि संसार और प्रियव्रत के हित में यही है कि प्रियव्रत पहले अपने सांसारिक कर्तव्यों का  पालन करे, फिर वैराग्य का मार्ग चुने, ब्रह्मा अपने पार्षदों के साथ प्रियव्रत के पास पहुँचे। उन्होंने उसे समझाते  हुए  कहा - पुत्र, ईश्वर का विधान है कि मनुष्य अपने शरीर के माध्यम से पहले अपने कर्मों का फल - सुख-दुख भोगे। इसकी अवज्ञा मत करो। जो बुद्धिमान पुरुष अपनी इन्द्रियों को जीत चुका है और अपनी आत्मा में ही रमण करता है, उसका गृहस्थ-जीवन भला क्या बिगाड़ सकता है? जैसे, किले में सुरक्षित रहकर लड़ने वाला राजा अपने प्रबल शत्रुओं को जीत लेता है, उसी तरह जिसे छह शत्...